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CG News: 1.70 करोड़ की मंजूरी बेअसर, सड़कों का हाल बेहाल, बच्चों और मरीजों के लिए बना खतरा

CG News: 1.70 करोड़ रुपए की स्वीकृति के बावजूद मरम्मत कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाया है, जिससे स्कूली बच्चों और मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

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सड़कों का हाल बेहाल (फोटो सोर्स- पत्रिका)

सड़कों का हाल बेहाल (फोटो सोर्स- पत्रिका)

CG News: गरियाबंद जिले के कोपरा-फिंगेश्वर क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में सड़कों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। सहसपुर, तरीघाट, लोहरसी, रवेली और कौंदकेरा जैसे बड़े गांवों को जोडऩे वाले प्रमुख मार्ग गड्ढों और कीचड़ में तब्दील हो गए हैं। आलम यह है कि इन जर्जर रास्तों पर सफर करना किसी खतरे से कम नहीं है, जिससे आम जनता में भारी आक्रोश व्याप्त है।

सहसपुर-कसेरुडीह और धुरसा-मुरमुरा मार्ग की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। सरगी नदी पर बना पुराना पुल पूरी तरह जर्जर हो चुका है। पुल के सरिए बाहर निकल आए हैं, जो राहगीरों और वाहनों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। बारिश के दिनों में पुल के ऊपर से पानी बहने के कारण गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कट जाता है। वहीं, निर्माणाधीन नए पुल में भी गुणवत्ता की अनदेखी की शिकायतें आ रही हैं, जिस पर सेतु विभाग के अधिकारियों ने अब तक संज्ञान नहीं लिया है।

टेंडर प्रक्रिया में अटकी राहत

जिला पंचायत सदस्य इंद्रजीत महाडिक ने इस गंभीर मुद्दे को कई बार बैठकों में उठाया है। उन्होंने विभाग पर आरोप लगाया कि संधारण अवधि खत्म होने का हवाला देकर अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं। इस संबंध में पीएमजीएसवाई के एसडीओ अभिषेक पाटकर ने बताया कि कुछ सड़कों की पांच साल की संधारण अवधि पूरी हो गई है।

राहत की बात यह है कि कुंडेल-पुरैना मार्ग के लिए 1 करोड़ 70 लाख रुपए की स्वीकृति मिल चुकी है, जिसकी टेंडर प्रक्रिया वर्तमान में प्रगति पर है। ग्रामीणों ने मांग की है कि जब तक नई सडक़ों का निर्माण शुरू नहीं होता, तब तक तत्काल गड्ढों की भराई और वैकल्पिक मरम्मत कार्य कराया जाए।

दोपहिया वाहन चालक फिसलकर हो रहे चोटिल

सड़कों पर जगह-जगह हुए गड्ढों में जलभराव के कारण हमेशा कीचड़ बना रहता है। इससे दोपहिया वाहन चालक आए दिन फिसलकर चोटिल हो रहे हैं। सबसे ज्यादा कठिनाई स्कूली बच्चों और गंभीर मरीजों को अस्पताल ले जाने में हो रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि मरम्मत के नाम पर विभाग हमेशा बजट की कमी का रोना रोता है, जबकि वास्तविकता में जनता धूल और कीचड़ फांकने को मजबूर है।

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