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जाते-जाते दूसरों में जान फूंक गए हरीश राणा, 13 साल बाद मिली थी मशीनों से मुक्ति, जानें सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

Harish Rana Case: करीब 13 सालों तक बिस्तर पर गंभीर हालात में रहने के बाद, हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इच्छा मृत्यु पैसिव यूथेनेसिया दी गई। उनके निधन के बाद परिवार ने उनके दिल का वॉल्व और आंखें कॉर्निया दान करने का बड़ा फैसला लिया, जिसकी देश की सबसे बड़ी अदालत ने सराहना की है।

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Harish Rana Case: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को गाजियाबाद निवासी हरीश राणा के परिवार की दिल खोलकर सराहना की, जिन्होंने उनकी मृत्यु के बाद अंगदान करने का महान फैसला लिया। हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से एक ऐसी कठिन हालत में थे, जहां उनका शरीर पूरी तरह मशीनों और मेडिकल उपकरणों के सहारे था। वह न चल सकते थे, न बोल सकते थे और न ही सामान्य जीवन जी सकते थे। उनके परिवार के लिए उन्हें इस हाल में देखना बेहद दर्दनाक था। एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर उन्हें 'पैसिव यूथेनेसिया' यानी जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी। 11 मार्च को आए कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद, 24 मार्च को दिल्ली के एम्स AIIMS अस्पताल में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली। दुख की इस घड़ी में परिवार ने जो अंगदान का फैसला लिया उसको कोर्ट ने मानवता की एक अनूठी मिसाल बताया।

दुख की घड़ी में दूसरों को दिया जीवन का उपहार

हरीश राणा की मृत्यु के बाद उनके परिवार ने एक ऐसा फैसला लिया जो समाज के लिए प्रेरणा बन गया। उन्होंने तय किया कि हरीश के जाने के बाद उनके अंगों को दान किया जाएगा ताकि किसी और की जिंदगी रोशन हो सके। डॉक्टरों की सलाह पर हरीश के दिल का वॉल्व और कॉर्निया आंखें दान किए गए। परिवार का मानना था कि भले ही हरीश अब उनके बीच नहीं हैं, लेकिन उनके अंगों के जरिए वे किसी और के जीवन में जीवित रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने की परिवार की हिम्मत की तारीफ

जब यह मामला दोबारा जस्टिस जेबी पार्डीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच के सामने आया, तो कोर्ट ने परिवार के इस कदम की दिल खोलकर तारीफ की। अदालत ने कहा, अपने प्रियजन को खोने के दुख के बावजूद, परिवार ने अंगदान जैसा बड़ा फैसला लेकर बहुत बड़ी उदारता दिखाई है। हरीश राणा ने प्रेम और करुणा के साथ दुनिया को अलविदा कहा।

दिल का वॉल्व और कार्निया दान किए गए

वहीं, सुनवाई के दौरान, राणा के परिवार के लिए उपस्थित वकील ने बताया कि उनकी मृत्यु का प्रमाणपत्र सर्वोच्च न्यायालय रजिस्ट्री में प्रस्तुत किया गया है। वकील ने यह भी बताया कि राणा के निधन के बाद उनके दिल का वॉल्व और कार्निया दान किए गए, क्योंकि ये अंग ही दान के लिए उपयुक्त पाए गए थे।

सम्मान के साथ जीने और मरने का अधिकार

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि यह मामला हमें याद दिलाता है कि चिकित्सा विज्ञान की भी अपनी सीमाएं होती हैं। मशीनों के सहारे किसी के जीवन को जबरदस्ती खींचना हमेशा सही नहीं होता। हरीश राणा की शांतिपूर्ण मृत्यु और उनके परिवार का निस्वार्थ कार्य यह संदेश देता है कि जीवन और मृत्यु दोनों में इंसान की गरिमा और उसकी इच्छा का सम्मान होना चाहिए। उनके परिवार के इस नेक काम की वजह से अब हरीश की यादें उन लोगों के जरिए हमेशा जिंदा रहेंगी, जिन्हें अंगदान से नया जीवन मिला है।

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