
बदहाल स्थिति में रखे वाद्य यंत्र
ग्वालियर। जिस धरती ने तानसेन जैसे महान संगीत साधक को जन्म दिया और जहां ग्वालियर घराने ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को नई पहचान दी, उसी प्रदेश में सरकारी संगीत शिक्षा व्यवस्था खुद बेसुरी होती जा रही है। मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के अधीन संचालित आठ शासकीय संगीत महाविद्यालयों में से सिर्फ खंडवा में नियमित प्राचार्य पदस्थ हैं। बाकी सात महाविद्यालय वर्षों से प्रभारी व्यवस्था के भरोसे चल रहे हैं। इनमें ग्वालियर, इंदौर, उज्जैन, धार, मंदसौर, नरसिंहगढ़ और मैहर शामिल हैं।
संगीत की नगरी ग्वालियर की स्थिति सबसे चिंताजनक है। शासकीय माधव संगीत महाविद्यालय में पिछले आठ वर्षों से स्थायी प्राचार्य नहीं है। एक प्रभारी के भरोसे प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था चल रही है। ऐसे में सवाल है कि जिन संस्थानों का उद्देश्य प्रदेश की सांगीतिक प्रतिभाओं को तराशना और उन्हें मंच तक पहुंचाना है, वहां स्थायी नेतृत्व का अभाव कब दूर होगा।
कभी 20-25 का स्टाफ, अब 12 पर टिका कॉलेज
जानकारों के अनुसार कुछ वर्ष पहले तक एक संगीत महाविद्यालय में 20 से 25 तक स्थायी कर्मचारी और शिक्षक होते थे। गायन, वादन और नृत्य की अलग-अलग विधाओं के विशेषज्ञ विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देते थे। अब कई जगह स्थायी स्टाफ घटकर करीब 12 रह गया है। शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए छह-सात अतिथि विद्वानों की सेवाएं ली जा रही हैं।
अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था से तत्काल जरूरत तो पूरी होती है, लेकिन इससे लंबे समय की गुरु-शिष्य परंपरा प्रभावित होती है। शास्त्रीय संगीत में नियमित मार्गदर्शन और वर्षों तक गुरु के साथ साधना को महत्वपूर्ण माना जाता है।
वाद्य यंत्रों की हालत भी दे रही बदहाली का सुर
महाविद्यालयों में सिर्फ पदों की कमी ही समस्या नहीं है। विद्यार्थियों की संगीत साधना के लिए जरूरी वाद्य यंत्र भी बदहाल स्थिति में हैं। कई जगह तबले के चमड़े फटे हैं, हारमोनियम की धौंकनी खराब है, तानपुरों के तार जंग खा चुके हैं और सितार के तार व पर्दे टूटे हुए हैं। पुराने वाद्य यंत्रों की समय पर मरम्मत और नए उपकरणों की उपलब्धता नहीं होने से विद्यार्थियों को अभ्यास में परेशानी होती है।
सवाल: कब तक चलेगा ‘प्रभारी राग’?
प्रदेश के आठ सरकारी संगीत महाविद्यालयों में सात जगह स्थायी प्राचार्य नहीं होने से प्रशासनिक फैसलों और संस्थानों के दीर्घकालीन विकास पर भी असर पड़ रहा है। ग्वालियर जैसे संगीत केंद्र में आठ साल से नियमित प्राचार्य नहीं होना व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
संस्कृति विभाग का जवाब
संस्कृति विभाग के संचालक एनपी नामदेव ने कहा कि प्रदेश के शासकीय संगीत महाविद्यालयों में परेशानियां हैं। पिछले दो-तीन वर्षों से नियमित नियुक्तियों के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन नई नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं। उन्होंने कहा कि वाद्य यंत्रों को लेकर किसी महाविद्यालय से शिकायत मिलती है तो आवश्यक सुधार कराया जाएगा। पुराने या खराब वाद्य यंत्रों की मरम्मत भी कराई जाएगी।
Updated on:
03 Sept 2026 07:31 pm
Published on:
03 Sept 2026 07:29 pm
