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जन के धन का खर्च बताने में टालमटोल, नियम को लेकर अफसर ही नहीं एकमत

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हनुमानगढ़

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vikas meel

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Updated: 22 Jul 2018, 5:12 PM IST

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हनुमानगढ़.

जनता का धन खर्च करने वाले सरकारी सिस्टम को इसका हिसाब-किताब बताने में जोर आ रहा है। इससे बचने के लिए नियमों की आड़ लेकर टालमटोल की जा रही है। आरटीआई के तहत पिछले विधानसभा चुनाव में वाहन किराए पर लेने तथा भुगतान आदि को लेकर जिला निर्वाचन अधिकारी, हनुमानगढ़ से सूचना मांगी गई थी। सूचना का अधिकार जागृति मंच की ओर से मांगी गई इस जानकारी को देने में पहले तो प्रशासन ने दोहरा मापदंड अपनाया। जब सूचना दी तो अधूरी देकर पिंड छुड़ा लिया। दरअसल, मंच ने विधानसभा चुनाव 2013 में मदनलाल पुरोहित को चुनाव ड्यूटी में किस पद पर लगाया गया तथा इस संबंध में जारी आदेश की सूचना मांगी थी। साथ ही उनकी कितने दिन ड्यूटी लगी, इस दौरान उनको भत्ते, चुनावी वाहन किराए आदि के पेटे कितना भुगतान किया गया।


इसकी भी सूचना मांगी गई। उप जिला निर्वाचन अधिकारी ने 14 जून 2018 को जवाब दिया कि चाही गई सूचना तृतीय पक्षकार से संबंधित है। इसलिए उनकी अनुमति के बिना उपलब्ध नहीं करवाई जा सकती। अत: आपका आवेदन दाखिल दफ्तर किया जाता है। मजेदार बात यह है कि इन्हीं सवालों को लेकर पुन: आवेदन उप जिला निर्वाचन अधिकारी की बजाय सीधा जिला निर्वाचन अधिकारी (कलक्टर) के समक्ष लगाया गया। इस बार जिला निर्वाचन अधिकारी ने बिन्दू संख्या एक की सूचना उपलब्ध करवा दी। जबकि उप जिला निर्वाचन अधिकारी ने तो दोनों ही बिन्दू की सूचना देने से मना कर दिया था। जिला निर्वाचन अधिकारी ने बिन्दू संख्या एक की सूचना दी कि मदन पुरोहित को प्रशिक्षण प्रकोष्ठ का सहायक प्रभारी अधिकारी नियुक्त किया गया था। मगर बिन्दू संख्या दो भत्ते, चुनावी वाहन किराए आदि के पेटे किए गए भुगतान की सूचना देने से इनकार कर दिया। इसकी वजह सूचना तृतीय पक्षकार से संबंधित बताई गई।


मजेदार बात है कि जिला निर्वाचन अधिकारी और उप जिला निर्वाचन अधिकारी ही तृतीय पक्षकार से संबंधित सूचना नियम को लेकर एकमत नहीं है। एक अधिकारी दोनों प्रश्नों को तृतीय पक्षकार से संबंधित बता रहा है तो दूसरे अफसर एक की सूचना दे रहे हैं। लेकिन दूसरे सवाल को तृतीय पक्षकार से संबंधित बता रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकारी खजाने से जनता का धन कर्मचारी को भुगतान किया गया तो फिर उसकी सूचना देने में क्या दिक्कतें आ रही हैं। खर्च का हिसाब देने में काहे का तृतीय पक्षकार का नियम।

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