
राजस्थान में नशे से HIV का खतरा बढ़ा (फोटो-एआई)
-अदरीस खान
हनुमानगढ़: एचआईवी/एड्स की रोकथाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद रक्त चढ़ाने से संक्रमण फैलने का जोखिम पूरी तरह खत्म करने की चुनौती अब भी बनी हुई है। राजस्थान के अधिकांश सरकारी और निजी ब्लड बैंकों में रक्त की जांच के लिए सबसे उन्नत मानी जाने वाली नैट (न्यूक्लिक एसिड टेस्ट) तकनीक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में संक्रमण के शुरुआती दौर में रक्त की जांच के दौरान वायरस पकड़ में नहीं आने का खतरा बना रहता है।
दूसरी ओर, रक्त को लंबे समय तक सुरक्षित रखकर जांच के विंडो पीरियड के गुजरने का इंतजार भी नहीं किया जा सकता। रक्त की सीमित उपयोग अवधि और मरीजों की जरूरत के बीच रक्त की सुरक्षा सुनिश्चित करना ब्लड बैंकों के सामने बड़ा सवाल बना हुआ है। वहीं, इंजेक्शन के जरिए हेरोइन, चिट्टा और मेडिकेटेड नशा लेने की प्रवृत्ति भी एचआईवी संक्रमण के लिहाज से चिंता का विषय है। संक्रमित सुई या सिरिंज साझा करने से वायरस फैल सकता है।
इसका प्रमाण यह है कि हनुमानगढ़ जिले में 2020-21 में जहां सिर्फ 89 एचआईवी संक्रमित पंजीकृत थे, वहीं 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 259 तक पहुंच गई। ऐसे में संक्रमण की रोकथाम के लिए नशे के जोखिमों पर अंकुश लगाने के साथ रक्त जांच की व्यवस्था को भी अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है। इसके बावजूद प्रदेश के अधिकांश ब्लड बैंक पारंपरिक जांच पद्धति पर निर्भर हैं। पैथोलॉजिस्ट बताते हैं कि करीब दस साल पहले नैट जांच को लेकर हुए अध्ययन के बावजूद ब्लड बैंकों में इस तकनीक का व्यापक विस्तार नहीं हो पाया है।
नैट तकनीक रक्त में वायरस के आनुवंशिक पदार्थ की पहचान करती है और संक्रमण का पता अपेक्षाकृत जल्दी लगा सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एचआईवी के लिए इसका विंडो पीरियड करीब 10 से 33 दिन हो सकता है। यह अवधि जांच की तकनीक और अन्य परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। नैट जांच का लाभ यह है कि एलाइजा जांच की तुलना में संक्रमण के कुछ शुरुआती मामले पकड़ में आ सकते हैं। दक्षिण भारत के कई राज्यों में सरकारी ब्लड बैंकों में भी इस पद्धति से रक्त की जांच की जा रही है, जबकि प्रदेश में इसकी उपलब्धता सीमित है।
ब्लड बैंकों के सामने दूसरी चुनौती रक्त की सीमित उपयोग अवधि है। जिला अस्पताल में होल ब्लड को 35 दिन के भीतर इस्तेमाल करना जरूरी बताया जाता है, क्योंकि इसके बाद उसकी उपयोगिता प्रभावित होती है। डेंगू सहित अन्य बीमारियों में मरीजों को रक्त के अलग-अलग घटकों की जरूरत पड़ती है और कई परिस्थितियों में उनकी तत्काल उपलब्धता जरूरी होती है। ऐसे में रक्त को लंबे समय तक रखकर संक्रमण की पहचान के लिए विंडो पीरियड गुजरने का इंतजार करना व्यावहारिक समाधान नहीं है।
यही वजह है कि रक्त की सुरक्षा के लिए केवल रक्तदाता से असुरक्षित यौन संबंधों, सुई के दोबारा इस्तेमाल और रक्त चढ़वाने के इतिहास के बारे में पूछना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। रक्तदाता की जानकारी जोखिम का आकलन करने में मदद करती है। नैट जैसी तकनीक की उपलब्धता बढ़ने से शुरुआती संक्रमण पकड़ने की संभावना बेहतर हो सकती है।
वर्तमान में प्रदेश के अधिकांश सरकारी ब्लड बैंकों में एचआईवी संक्रमण की जांच चौथी पीढ़ी की एलाइजा पद्धति से की जाती है। इस जांच का विंडो पीरियड संक्रमण और जांच की परिस्थितियों के अनुसार लगभग 18 से 45 दिन तक हो सकता है। यानी संक्रमण के शुरुआती दिनों में जांच कराने पर वायरस का पता नहीं चल पाने की आशंका रहती है। इस अवधि में संक्रमित व्यक्ति रक्तदान कर दे, तो जांच में संक्रमण की पुष्टि नहीं होने का जोखिम बना रहता है। हालांकि, रक्तदान से पहले दाता की स्क्रीनिंग और निर्धारित जांच की जाती है, लेकिन जांच संक्रमण की शुरुआती अवस्था में शत-प्रतिशत पहचान की गारंटी नहीं देती।
जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त की जांच चौथी पीढ़ी की एलाइजा पद्धति से की जाती है। इसका विंडो पीरियड 18 से 45 दिन है। इस अवधि से पहले मौजूदा तकनीक से एचआईवी संक्रमण की पुष्टि नहीं हो सकती।
-डॉ. राजविंद्र कौर, पैथोलॉजिस्ट, राजकीय जिला अस्पताल, हनुमानगढ़
Updated on:
26 Oct 2026, 11:31 AM IST
Published on:
26 Oct 2026, 11:29 AM IST
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