
मानसून में त्वचा से जुड़ी ये 8 समस्याएं भी तेजी से बढ़ती हैं (photo- freepik)
Monsoon Skin Disease: बारिश का मौसम गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन त्वचा के लिए कई नई चुनौतियां भी लेकर आता है। बाहर की नमी, लगातार पसीना, गीले कपड़े, बंद जूते और गंदा पानी त्वचा पर संक्रमण का खतरा बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि मानसून में त्वचा संबंधी समस्याओं के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है।
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) और PubMed Central (PMC) में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, मानसून जैसे नम वातावरण में फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण तेजी से फैलते हैं। वहीं NHS का कहना है कि त्वचा की सिलवटों में लंबे समय तक नमी रहने से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। आइए जानते हैं कि बारिश के मौसम में कौन-सी 8 स्किन प्रॉब्लम्स सबसे ज्यादा देखने को मिलती हैं और इनसे बचने के आसान तरीके क्या हैं।
फंगल इंफेक्शन (दाद)
मानसून में हवा में नमी बढ़ने के कारण फंगस गर्म और नम जगहों पर तेजी से पनपता है। इसके कारण गर्दन, कमर, जांघ और बगल जैसे पसीने वाले हिस्सों में गोल लाल चकत्ते, तेज खुजली और त्वचा के छिलने की समस्या होने लगती है। नहाने के बाद पूरे शरीर को अच्छी तरह सुखाएं, रोज धुले हुए सूती कपड़े पहनें और अपना तौलिया किसी के साथ साझा न करें।
एथलीट फुट
बारिश के मौसम में पैर अक्सर गीले हो जाते हैं। अगर जूते और मोजे लंबे समय तक गीले रहें, तो पैरों की उंगलियों के बीच फंगल संक्रमण हो जाता है, जिसे एथलीट फुट कहते हैं। इससे पैरों में खुजली, जलन, बदबू और त्वचा फटने लगती है। गीले मोजे तुरंत बदलें, पैरों को साफ पानी से धोकर अच्छी तरह सुखाएं और रोजाना साफ मोजे ही पहनें।
इंटरट्राइगो (त्वचा की सिलवटों में संक्रमण)
बगल, गर्दन, पेट या स्तनों के नीचे लंबे समय तक नमी रहने से त्वचा आपस में रगड़ खाने लगती है, जिससे इंटरट्राइगो संक्रमण होता है। यह समस्या अधिक वजन वाले लोगों और मधुमेह के मरीजों में ज्यादा देखी जाती है, जिसमें प्रभावित हिस्से में लालपन, दर्द और बदबूदार डिस्चार्ज होता है। त्वचा की सिलवटों वाली जगहों को हमेशा सूखा रखें, पसीना आने पर कपड़े बदलें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से एंटीफंगल क्रीम लगाएं।
घमौरियां
हालांकि घमौरियां गर्मियों की समस्या मानी जाती हैं, लेकिन मानसून की भारी उमस और पसीने के कारण भी यह परेशानी बनी रहती है। इसमें त्वचा पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं, जिनमें लगातार चुभन और खुजली होती है। इस मौसम में हमेशा ढीले-ढाले और सूती कपड़े पहनें। ज्यादा पसीना आने पर त्वचा को तुरंत साफ और ठंडा रखें।
बैक्टीरियल स्किन इंफेक्शन
बारिश के मौसम में बैक्टीरिया बहुत सक्रिय होते हैं। अगर त्वचा पर पहले से कोई कट, खरोंच या घाव है, तो गंदे पानी के संपर्क में आने से बैक्टीरिया आसानी से संक्रमण फैला देते हैं। इसके कारण त्वचा पर फोड़े-फुंसियां, पस और सूजन हो सकती है। किसी भी घाव या कट को हमेशा साफ और एंटीसेप्टिक से सुरक्षित रखें। बारिश के गंदे पानी के संपर्क में आने से बचें और संक्रमण बढ़ने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें।
एलर्जी और रैश
मानसून के दौरान वातावरण में धूल, फफूंद (मोल्ड), कीड़े-मकोड़े और कुछ विशेष पौधों की संख्या बढ़ जाती है। इनके संपर्क में आने से संवेदनशील त्वचा पर एलर्जी हो सकती है, जिससे अचानक लाल चकत्ते, तेज खुजली और सूजन की समस्या उभर आती है। एलर्जी पैदा करने वाली चीजों और कीड़ों से दूरी बनाकर रखें। त्वचा पर तेज खुजली या चकत्ते होने पर बिना देर किए डॉक्टर की सलाह लें।
एक्जिमा का बढ़ना
जिन लोगों को पहले से एक्जिमा (त्वचा का सूखापन और सूजन) की बीमारी है, उनके लिए मानसून काफी दर्दनाक हो सकता है। इस मौसम की उमस और पसीना एक्जिमा को और बढ़ा देता है, जिससे त्वचा अत्यधिक सूखी, लाल और खुजलीदार हो जाती है।त्वचा की नमी बनाए रखने के लिए नियमित रूप से मॉइस्चराइजर लगाएं, ज्यादा गर्म पानी से नहाने से बचें और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयां समय पर लें।
नाखून का फंगल संक्रमण
बारिश के दिनों में लंबे समय तक गीले या बंद जूते पहनने का असर नाखूनों पर भी पड़ता है। नमी के कारण नाखूनों में फंगल इंफेक्शन हो जाता है, जिससे नाखून पीले या काले पड़ने लगते हैं, मोटे हो जाते हैं और धीरे-धीरे टूटने लगते हैं। मानसून में अपने नाखूनों को हमेशा छोटा और साफ रखें, पैरों को सूखा रखें और जहां तक संभव हो गीले जूते पहनने से बचें।
इन लोगों में मानसून के दौरान स्किन इंफेक्शन का खतरा ज्यादा हो सकता है-
अगर आपको खुजली लगातार बढ़ रही हो, त्वचा से पस निकल रही हो, लालपन तेजी से फैल रहा हो, तेज दर्द या बुखार हो, या घरेलू देखभाल के बाद भी 3-5 दिन में आराम न मिले, तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से तुरंत सलाह लें।
डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।
Published on:
30 Jun 2026 02:24 pm
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