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विक्रम-1 की पहली ऑर्बिटल उड़ान रही सफल, IN-SPACe प्रमुख गोयनका बोले- पहला ही मिशन रहा कामयाब

Skyroot Aerospace Mission Aagaman: भारत के पहले निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट 'विक्रम-1' ने श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक उड़ान भरकर अंतरिक्ष की कक्षा में प्रवेश किया है। शुरुआती ऑटोमैटिक सीक्वेंस में आई एक मामूली तकनीकी खामी को महज 35 मिनट में ठीक करने के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस ने यह ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की। इसके साथ ही भारत निजी स्पेस सेक्टर में यह क्षमता पाने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है।
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Vikram 1 rocket launch success

विक्रम-1 की पहली ऑर्बिटल उड़ान रही सफल, ANI Photo

Vikram 1 rocket launch success: भारत के अंतरिक्ष इतिहास में आज एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। देश के पहले निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट 'विक्रम-1' (Vikram-1) ने अपनी पहली ही उड़ान में अंतरिक्ष की कक्षा में सफलतापूर्वक कदम रख दिया है। सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किए गए इस ऐतिहासिक मिशन को 'मिशन आगमन' (Mission Aagaman) नाम दिया गया था। इस सफलता के साथ ही भारत, निजी क्षेत्र में ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है।

शुरुआत में आई मामूली तकनीकी खामी

IN-SPACe के चेयरमैन पवन के. गोयनका ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि लॉन्चिंग के शुरुआती ऑटोमैटिक सीक्वेंस के दौरान एक बेहद मामूली दिक्कत आई थी, जिसे तुरंत सुधार लिया गया। उन्होंने कहा कि 'शुरुआत में ऑटोमैटिक लॉन्च सीक्वेंस में एक छोटी सी रुकावट आई थी, जो बहुत ही मामूली थी। इसे तुरंत ठीक करके दोबारा शुरू किया गया और उसके बाद पूरा मिशन बेहद शानदार और सुचारू रहा। टीम ने इस मुकाम तक पहुंचने और पहले ही प्रयास में सफल होने के लिए कई सालों तक कड़ी मेहनत की है।'

इस तकनीकी खामी को स्पष्ट करते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के चेयरमैन वी. नारायणन ने बताया कि जब ऑटोमैटिक सीक्वेंस चल रहा था, तब ग्राउंड सेगमेंट से ऑनबोर्ड कंप्यूटर में डेटा ट्रांसफर के दौरान एक ग्लिच (खामी) आ गया था। टीम ने मुस्तैदी दिखाते हुए मात्र 35 मिनट में इस समस्या को सुलझाया और रॉकेट ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी।

28 साल की युवा टीम ने कार्बन कम्पोजिट से बनाया रॉकेट

स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) के सीईओ और संस्थापक पवन कुमार चंदना ने इस मिशन को वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि 'यह पहली बार है जब भारत में किसी निजी कंपनी ने खुद रॉकेट बनाया, खुद का लॉन्च पैड तैयार किया और सफल ऑर्बिटल मिशन को अंजाम दिया। हमें गर्व है कि महज 28 साल की औसत उम्र वाली एक युवा टीम ने भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट तैयार किया है। यह रॉकेट पूरी तरह से कार्बन कंपोजिट से बना है।' वहीं कंपनी के सीओओ नागा भरत डाका ने इसे भारत के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर करार दिया।

450 किमी की कक्षा में स्थापित किए पेलोड्स

24 मीटर ऊंचे इस विक्रम-1 रॉकेट ने अपनी उड़ान के दौरान सभी तय चरणों (स्टेज सेपरेशन्स) को सफलतापूर्वक पूरा किया। रॉकेट के सॉलिड प्रोपल्शन फेज के बाद इसके 'ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल' (OAM) ने अंतरिक्ष में काम करना शुरू किया। इस मॉड्यूल में लगे 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन ने रॉकेट को अंतिम धक्का दिया और पेलोड्स को पृथ्वी से करीब 450 किलोमीटर ऊपर लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित कर दिया। यह मॉड्यूल अंतरिक्ष में रुकने और दोबारा शुरू (स्टार्ट, स्टॉप और रीस्टार्ट) होने की क्षमता रखता है।

पीएम मोदी का संदेश

विक्रम-1 अपने साथ कई बेहद खास पेलोड लेकर अंतरिक्ष में गया है। इस उड़ान में सबसे खास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ से लिखा एक पोस्टकार्ड है, जिस पर 'वंदे मातरम' अंकित है। इसके साथ ही स्काईरूट टीम, निवेशकों और शुभचिंतकों के हस्तलिखित संदेश भी अंतरिक्ष भेजे गए हैं। बेंगलुरु की कंपनी 'कॉस्मॉस डायमंड्स' द्वारा प्रयोगशाला में तैयार किया गया एक विशेष हीरा 'डायमंड लोटस' भी इस मिशन के तहत अंतरिक्ष का सफर तय कर रहा है।