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शरीर से सड़ा खून चूसकर बाहर उगल देती ‘जोक’, ठीक कर दे रही कैंसर – डायबिटीज !

Health News: जोक मरीज के घाव या प्रभावित अंग पर इसे रखा जाता है, जहां से यह खून चूस लेती है। एक जोक 20 से 30 एमएल तक खून पी सकती है।

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Health News: शहर में पिछले एक साल में लीच (जोक) थैरेपी से इलाज कराने वालों की संख्या बढ़ी है। इसमें जोक के माध्यम से रक्त विकार, वेरिकोज वेन, खून के थक्के, मवाद या कैंसर, एग्जिमा, सोलोसिस व डायबिटीज के मरीजों का इलाज किया जा रहा है।

अष्टांग आयुर्वेद महाविद्यालय में हर महीने लगभग 100 मरीज इसका लाभ ले रहे हैं। जिला अस्पताल के साथ ही शहर में लगभग 15 निजी संस्थान भी इस थैरेपी को अपनाकर इलाज कर रहे हैं।

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20 से 30 एमएल तक खून पी सकती है जोक

आयुर्वेद में खून निकालकर कई तरह से थैरेपी होती है। इसमें एक लीच थैरेपी है। इसमें मरीज के घाव या प्रभावित अंग पर इसे रखा जाता है, जहां से यह खून चूस लेती है। एक जोक 20 से 30 एमएल तक खून पी सकती है। सिर में जमने वाले खून के थक्के तक इससे निकाले जा रहे हैं। किशोर अवस्था में चेहरे पर होने वाले पिंपल्स का भी इलाज हो रहा है। इसके ट्रीटमेंट से पहले मरीज की लैबोरेटरी, एचआइवी टेस्ट व संक्रामक रोग की जांच कराई जाती है।

बालों के ट्रीटमेंट में मदद

बालों की कई प्रकार की समस्याएं सामने आ रही हैं, जैसे सफेद होना, झड़ना आदि। इसमें सिर पर उस जोक को लगाकर अशुद्ध रक्त पिलाया जाता है। एक माह में ही बालों की समस्या में भी 70 फीसदी तक आराम होता है।

हल्दी या सेंधा नमक से उगल देती है खराब खून

जोक के मुंह पर हल्दी या सेंधा नमक लगाया जाता है, जिससे वह पूरा खून उगल देती हैं। फिर इसे 7 दिन साफ पानी में रखा जाता है। मरीज को उसी जोक से थैरेपी दी जाती है। एक मरीज के इलाज के बाद 30 दिन तक इस जोक से कोई थैरेपी नहीं होती।

पांच प्रकार की जोक का उपयोग, भोपाल से लाए

जोक दो प्रकार की होती है सविश व निर्विश। इसमें निर्विश जोक का उपयोग ही किया जाता है। निर्विश में कपिला, पिंगला, कृष्णमुखी, पुंडरिक, शंखमुखी होती है। आयुर्वेद महाविद्यालय में पांच प्रकार की जोक है। इन्हें भोपाल से लाते हैं।

रक्त के विकार को दूर करती है हिरूडीन लार

प्रोफेसर डॉ. अखलेश भार्गव ने बताया, यहां दस वर्ष से प्रयोग हो रहा है। जोक की लार में हिरूडीन नामक पद्धार्थ होता है, जो रक्त विकार को भी दूर करता है। आयुर्वेद कॉलेज के डॉ. अजीत ओझा ने बताया, थैरेपी का वर्णन 2500 साल पहले आचार्य सुश्रुत ने किया है।