
Independence day 2021: इंदौर. देश को स्वाधीनता दिलाने के लिए देश में लम्बी लड़ाई लड़ी गई थी और आजादी की जंग के अनेक सिपाही तो गुमनाम ही रह गए। आज आपको बताने जा रहे है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पहले देश की रियासत के राजाओं ने भी अंग्रेजी हुकूमत से जमकर लड़ाई लड़ी थी।
फिरंगियों को नाको चने चबाने की पहचान बनाने वाले राघौगढ़ रियासत के राजा दौलतसिंह राठौर की 7वीं पीढ़ी के युवा सदस्य इसी पहचान को बचाने के लिए संघर्षरत हैं। शहर से 50 किमी दूरी पर इंदौर-चापड़ा के बीच स्थिति राघौगढ़ में क्रांतिकारियों का खजाना छिपा कर रखा था। रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे ने खजाना संभालने की जिम्मेदारी राजा दौलतसिंह को दी थी, उन्होंने पूरी शिद्दत से सुरक्षा की और अंग्रेजों के हाथ नहीं लगने दिया। खजाने के स्थान को स्मारक बनाने और पहचान दिलाने का जिम्मा दौलतसिंह की सातवीं पीढ़ी के टिकेंद्र सिंह राठौर ने लिया है।
टिकेंद्र सिंह राठौर बताते हैं, केंद्र व राज्य सरकार दोनों को कई बार चिठ्ठी लिख चुके हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री को अवगत करा दिया, लेकिन उपेक्षित नजरिए के चलते वहां अतिक्रमण हो रहा है। राठौर का कहना है, हमारे पूर्वज खजाने की कहानी पूरी प्रामाणिकता के साथ बताते हैं। क्रांति के समय के बहुत ही कम स्थल देश में बचे हैं। यह सघन जंगल का इलाका था, क्रांतिकारी यहां आकर रणनीति बनाते थे। तात्या टोपे अनेक बार यहां आए। एक बार रानी लक्ष्मीबाई भी आई थी। सिंधिया और होलकर स्टेट के बीच राघौगढ़ 22 गांव की स्वतंत्र रियासत थी।
डाउनिंग स्ट्रीट से लड़ी जाती थी आजादी की लड़ाई
उन दिनों किसी तरह का संगठन बनाने पर पांबदी थी। इस समस्या को हल करने के लिए हम कुछ मित्रों ने लोकसेवा परिषद समूह बनाया और आंदोलन को आगे बढ़ाया। 1935 में होलकर राज था। माणिकबाग रेलवे गेट पर गदर हुआ था। हमारे साथी और पुलिस अधिकारी के बीच झड़प हो गई। जमकर गोलियां और पत्थर चले। यह सीन एक-दो बार नहीं कई बार बने, तब यह आजादी मिली है। किशनलाल गुप्ता बुजुर्ग जरूर हो गए, लेकिन आंदोलन यादों से जोश से भर जाते हैं। आंदोलन का मुख्य केंद्र खजूरी बाजार होता था। यहां 10 डाउनिंग स्ट्रीट थी, जहां से आजादी की लड़ाई लड़ी जाती थी। नई पीढ़ी को इसे बताना जरूरी है।
अब जमीन पर हक पाने का युद्ध
स्वतंत्रता के लिए आदिवासियों को एकजुट करने के जुर्म में जेल गए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रभुदयाल चौबे ने मालवा-निमाड़ के आंदोलन में महती भूमिका निभाई थी। सेनानियों का समूह जो काम देता पिताजी में उसे मैदान में जाकर करने का माद्दा था। उनके इसी साहस और माद्दे ने उनकी पीढ़ियों को भी प्रेरित किया। यह परिवरा अब जीरापुर बांध परियोजना में अपनी जमीन देने वाले गरीब वर्ग के किसानों की जमीन को बापस दिलाने के लिए काम कर रहा है।
Updated on:
15 Aug 2021 07:31 am
Published on:
14 Aug 2021 12:42 pm
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