
देश के विभाजन की गवाह इंदौर की एक सडक़
इंदौर @श्रुति अग्रवाल. देश के बंटवारे को 70 बरस पूरे होने जा रहे हैं। शहर की एक सडक़ आज भी उस स्याह सच्चाई की जिंदा मिसाल बनी हुई है। शरणार्थी कैम्प के आधार पर बसाए गए लोगों की दो बस्तियों के बीच यह सडक़ विभाजन रेखा की तरह है। ओरछाई और मानपुरी बस्ती लोगों के जेहन में विभाजन की पीड़ा और पूर्वजों के संघर्ष को जीवित रखे हुए है। बंटवारे की घोषणा के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बसे लोगों ने भारत की ओर रुख करना शुरू किया। इन लोगों को भारत लाने से पहले अलग-अलग कैम्प में रखा गया। इंदौर आने वाले लोगों को इंदौर में दो जगह रखा गया, खालसा स्टेडियम और वैष्णव स्टेडियम। इनके नाम थे, ओरछा कैम्प और मानपुर कैम्प। बाद में जब सिंधी कॉलोनी में इन्हें बसाया गया तो कॉलोनी की सडक़ भी इन कैम्प के साथ दो हिस्सों में बंट गई। सडक़ के सीधे हिस्से में मानपुर बसा तो उल्टे (लेफ्ट) हिस्से में ओरछा। जो लोग ओरछा कैम्प में थे वे ओरछा रियासती कहलाए। मानपुर में बसे लोग मानपुर वाले।
सडक़ बन गई अघोषित लकीर
मानपुर की तरफ रहने वाले पुरुषोत्तम केसरवानी अपने पिता की यादों में खो जाते हैं। वे कहते हैं पिता सिंध से आए तो रेल से महू में उतरे। ओरछा के कैंप में काफी दिन रहे। उस कैम्प में नए रिश्ते बने। नए नातों के ताने बाने में उन सब ने साथ रहना स्वीकारा। सभी का कहना था कि हम जड़ों से अलग हुए हैं, इसलिए अब साथ रहना है। नई जगह में साथ रहेंगे तब ही आगे बढ़ पाएंगे। इसके बाद जैसे-जैसे भारत सरकार ने हमारी मदद की हमने अपने घर बनाने शुरू किए। ओरछा कैम्प से कोई भी नया बाशिंदा आता तो हमारी कोशिश उसे अपनी साइड में जगह दिलवाने की होती।
अब भी मजाक में होता है जिक्र
सिंधी समाज के वरिष्ठ सदस्य किशोर कोडवानी बताते हैं कि बंटवारे के हादसे की यह सडक़ अपने आप में बंटवारे की यादें जिंदा रखती है। अभी भी पंचायत या किसे सम्मेलन में हंसी-मजाक में ओरछाई और मानपुरी आपस में व्यंग्य कर देते हैं। हालांकि यही सडक़ हमारी मेहनत और संघर्ष की कहानी भी कहती है। जब ओरछा और मानपुर बसा था तब दोनों में आर्थिक अंतर भी था जो अब नदारद है। दोनों ही तरफ के लोगों ने संघर्ष कर समाज में अपना मुकाम हासिल कर लिया है।
गम के साथ खुशियां भी साझा कर ली
ओरछा की तरफ रहने वाले डॉ. मोहन कृष्णानी बताते हैं, इस तरफ वालों की माली हालत कमजोर पर हौसले बुलंद थे। बुजुर्ग बताते हैं कि वे अपनी जगह से कटकर लंबे समय तक ट्रेन में रहे। जगह की कमी के कारण मेरा परिवार रेल में ही रुक गया। पिताजी बताते हैं कि वहीं सारे रिश्ते बने। गम साझे थे इसलिए खुशियां साझा करने की कोशिशें शुरू हुईं, साथ ही शुरू हुआ वादा साथ रहने का। इस वादे के कारण ओरछा कैम्प के सभी लोगों ने साथ रहना पसंद किया। पिताजी ने आकर गोशाला का काम शुरू किया और हम बसते चले गए। हालांकि मैंने ओरछा में तंगी और गुरबत भी देखी है। उस समय जो अघोषित रेखा बनी, यह जेहन में अभी भी कहीं न कहीं कायम है।
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