15 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

250 करोड़ से ज्यादा खेल सामग्री का कारोबार

शहर में नाम मात्र का उत्पादन, परिधान तक नहीं बनते  

3 min read
Google source verification

जबलपुर @ज्ञानी रजक. खेलों में अग्रणी जबलपुर इसके परिधान व उपकरण तैयार करने में अभी पीछे है। यहां 50 से अधिक राज्य एवं जिला स्तरीय खेल संघों के मुख्यालय हैं। स्कूल-कॉलेज के अलावा संघों से जुड़े 8 हजार से अधिक खिलाड़ी हर साल किसी न किसी खेल में शामिल होते हैं। इनकी खेल सामग्री संबंधी जरूरत तो पूरी हो जाती है लेकिन दुकानों में दूसरे शहरों की खेल सामग्री होती है। गारमेंट का बड़ा कारोबार शहर में चलता है लेकिन स्पोट्र्स वेयर स्थापित नहीं हो सका है। कारोबारियों को दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। बाहर से सामग्री आने से खिलाडिय़ों को ज्यादा कीमत पर मिलती है।

जिले में हर साल संभागीय, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं होती हैं। एसजीएफआई की सूची में वर्तमान में करीब 75 खेल हैं। इनमें शामिल खिलाडिय़ों को स्पोट्र्स वेयर की आवश्यकता होती है। इसमें टे्रकसूट, टी-शर्ट, निकर, शाट्स आदि शामिल हैं। इसी प्रकार सैकड़ों प्रकार की खेल सामग्री चाहिए होती है। आजकल लोगों के स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता बढऩे के कारण वे भी किसी खेल गतिविधि से जुड़े हैं। ऐसे में यह कारोबार अच्छी स्थिति में रहता है। एक अनुमान मुताबिक जिले में हर साल 200 से 250 करोड़ का खेल सामगी का व्यवसाय है। लेकिन इसमें जबलपुर का हिस्सा नाममात्र का है। ऐसे में खिलाडिय़ों को थोड़ी ज्यादा कीमत में इनका क्रय करना पड़ता है।

यह है स्थिति

- जिले में 50 से अधिक राज्य व जिला स्तरीय खेल संघ।
- चार सरकारी विश्वविद्यालय

-100 से अधिक निजी एवं सरकारी कॉलेज।

- चार हजार से अधिक सरकारी एवं निजी स्कूल।
- शैक्षणिक संस्थाओं एवं खेल संघों के 8 हजार से ज्यादा खिलाड़ी।

- 250 करोड़ से ज्यादा खेल सामग्री एवं किट का शहर में कारोबार।
- 15 बड़े एवं 200 से अधिक छोटे व मध्यम श्रेणी के खेल सामग्री विक्रेता।

- शहर में 500 से अधिक छोटी एवं बड़ी गारमेंट यूनिट।

IMAGE CREDIT: patrika

कैरम बोर्ड और बल्ले
जहां खेल सामग्री की बात की जाए तो यहां पर कैरम बोर्ड का पुराना कारखाना है। कुछ जगहों पर लकड़ी के बल्ले बनते हैं। हालांकि वह उस गुणवत्ता के नहीं होते जिनका इस्तेमाल खेल अभ्यास एवं प्रतियोगिताओं में किया जा सके। इसी प्रकार ट्रॉफी एवं मोमेंटो भी असेम्बल होता है। इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी व्यापारी बाहर से मंगाते हैं।

लोवर और टी-शर्ट का उत्पादन

जिले में स्पोट्र्स वेयर के रूप में करीब 50 गारमेंट कारोबारी लोवर तैयार करते हैं। इसी प्रकार चार से पांच फर्म टी-शर्ट तैयार करती हैं। टे्रक सूट बनाने वाले भी गिनती के हैं। ऐसे में खिलाडिय़ों को लुधियाना, मेरठ, जालंधर, मुरादाबाद, दिल्ली जैसे शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है। टे्रकसूट, शाट्स, टी-शर्ट और दूसरे खेल परिधानों के लिए व्यापारी इन्हीं शहरों पर निर्भर हैं। इसी प्रकार टे्रडमिल, जिम्नेजियम की सामग्री और गेंद, बल्ला से लेकर अन्य खेल सामग्री भी यही से आती है।

संस्थान करते हैं लाखों की खरीदी

जिले में खेल विभाग, स्पोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया जैसे खेल संस्थान हैं। आर्चरी एवं शूटिंग एकेडमी है। अकेले इन संस्थानों का सालाना बजट 80 से 100 लाख के बीच होता है। इसके अलावा हर कॉलेज कम से कम 50 हजार और स्कूल भी 20 से 30 हजार की सामग्री खरीदते हैं। प्रत्येक विश्वविद्यालय से 20 से 25 टीमें हर साल अलग-अलग स्तर की खेल स्पर्धाओं में भाग लेती हैं। इनके द्वारा भी लाखों की खेल सामग्री खरीदी जाती है।


खेलों के लिए किट और सामग्री की आवश्यकता होती है। विभाग इनकी खरीदी करता है। इसी प्रकार कई खेल संघ एवं स्कूल कॉलेज भी इन्हें लेते हैं। स्थानीय स्तर पर इनका निर्माण होता है तो लागत कम होने से कीमत भी घटेगी।

संतोष सिंह राजपूत, जिला खेल एवं युवा कल्याण अधिकारी

खेल सामग्री दूसरे राज्यों से आती है। स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग कम है। कैरम बोर्ड तैयार करवाते हैं। उसकी खपत उतनी नहीं है। शहर में खेल सामग्री का निर्माण एवं उत्पादन बढ़ता है तो हमें सारी चीजों के लिए बाहर नहीं जाना पडेग़ा।
एनके अग्रवाल, खेल सामग्री विक्रेता

खेल किट का उत्पादन नया क्षेत्र है। यह संभावनाओं से भरा हुआ है। कुछ कारोबारी लोवर और टी-शर्ट बनाते हैं। रेडीमेड गारमेंट कॉम्पलेक्स में इसे बढ़ावा दिया जाएगा। यदि डिमांड आती है तो खेल किट ज्यादा मात्रा में तैयार कर सकते हैं।

संबंधित खबरें

श्रेयांस जैन, एमडी जबलपुर गारमेंट एंड फैशन डिजाइन क्लस्टर