
छत्तीसगढ़ की जड़ी-बूटियों से महकेगी दुनिया (photo source- Patrika)
Chhattisgarh Herbals: छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में सदियों से छिपी औषधीय संपदा अब वैश्विक बाजार तक पहुंचने की तैयारी में है। बस्तर, सरगुजा और वनांचल क्षेत्रों में मिलने वाली गिलोय, अश्वगंधा, शतावरी, कालमेघ, सफेद मूसली, गुड़मार और जंगली हल्दी जैसी जड़ी-बूटियां अब केवल घरेलू उपचार तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि “छत्तीसगढ़ हर्बल्स” ब्रांड के जरिए अंतरराष्ट्रीय पहचान की ओर बढ़ रही हैं।
सीएम साय के नेतृत्व में राज्य सरकार वन आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए जड़ी-बूटी सेक्टर को विशेष प्राथमिकता दे रही है। सरकार का फोकस केवल संग्रहण तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करने पर है। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप और बोर्ड अध्यक्ष विकास मरकाम के मार्गदर्शन में यह अभियान तेजी से जमीन पर उतर रहा है।
राज्य सरकार महिला स्व-सहायता समूहों और वनवासियों को जड़ी-बूटियों के वैज्ञानिक संग्रहण और प्रसंस्करण की ट्रेनिंग दे रही है। गांव स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट, ड्रायिंग सेंटर और मदर नर्सरी विकसित की जा रही हैं ताकि कच्चे उत्पादों को सीधे तैयार हर्बल प्रोडक्ट में बदला जा सके। इससे उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ रही है और महिलाओं की आय कई गुना तक बढ़ रही है।
सरकार “छत्तीसगढ़ हर्बल्स” ब्रांड के तहत हर्बल चूर्ण, अर्क, तेल, औषधीय पेय और प्राकृतिक स्वास्थ्य उत्पादों को बाजार में उतार रही है। राज्य के उत्पादों को राष्ट्रीय प्रदर्शनियों, ट्रेड फेयर और रिटेल आउटलेट्स के जरिए बड़े बाजारों से जोड़ा जा रहा है। इसके साथ ही ई-कॉमर्स और निर्यात संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है ताकि छत्तीसगढ़ की जड़ी-बूटियां विदेशी बाजारों तक पहुंच सकें।
कोरोना महामारी के बाद पूरी दुनिया में आयुर्वेद और हर्बल उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है। ऐसे में छत्तीसगढ़ के पास प्राकृतिक और ऑर्गेनिक औषधीय पौधों का बड़ा भंडार होने के कारण यह राज्य वैश्विक हर्बल इंडस्ट्री का बड़ा केंद्र बन सकता है। बस्तर की मिट्टी में मिलने वाली कई दुर्लभ वनस्पतियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहद मूल्यवान मानी जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि वैज्ञानिक प्रमाणन, बेहतर पैकेजिंग और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर लगातार काम किया जाए, तो “छत्तीसगढ़ हर्बल्स” भविष्य में भारत का बड़ा ग्लोबल हर्बल ब्रांड बन सकता है।
इस पूरी योजना का सबसे बड़ा लाभ वनांचल की महिलाओं को मिल रहा है। पहले जो महिलाएं केवल जंगलों से जड़ी-बूटियां इकट्ठा करती थीं, अब वे प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग का हिस्सा बन रही हैं। इससे गांवों में रोजगार बढ़ा है और पलायन कम हुआ है। ‘लखपति दीदी’ अभियान और ‘वोकल फॉर लोकल’ मिशन के साथ जुड़कर यह पहल महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बना रही है। कई स्व-सहायता समूह अब हर्बल उत्पाद तैयार कर सीधे बाजार में बेच रहे हैं, जिससे उनकी मासिक आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
राज्य में 65 से अधिक लघु वन उपज प्रजातियों की MSP पर खरीदी की जा रही है। वहीं 1500 से अधिक पारंपरिक वैद्यों के ज्ञान को दस्तावेजीकृत कर वैज्ञानिक रूप देने का काम भी चल रहा है। सरकार की कोशिश है कि पारंपरिक आदिवासी ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाई जाए।छत्तीसगढ़ अब केवल खनिज और वन संपदा वाला राज्य नहीं, बल्कि भारत के उभरते “हर्बल हब” के रूप में अपनी नई पहचान बना रहा है। जंगलों की खुशबू अब वैश्विक बाजार तक पहुंचने लगी है और इसके केंद्र में हैं वनांचल की आत्मनिर्भर महिलाएं।
Updated on:
03 Jun 2026 01:41 pm
Published on:
03 Jun 2026 01:39 pm
बड़ी खबरें
View Allजगदलपुर
छत्तीसगढ़
ट्रेंडिंग
