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झीरम हमले के 13 साल बाद भी अनसुलझे सवाल, 10 दोषी लेकिन साजिश का सच अब भी क्यों खामोश?

Jhiram Valley attack: झीरम हमले के 13 साल बाद भी कई सवाल अनसुलझे हैं। 10 दोषियों के बावजूद साजिश का पूरा सच सामने नहीं आया, राजनीतिक कारण और सुरक्षा चूक पर सवाल कायम हैं।
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Jhiram case

झीरम कांड हमला ( File Photo - Patrika )

Jhiram attack: झीरम घाटी हमले के 13 साल बाद 5 सितंबर को एनआईए की विशेष अदालत ने ट्रायल का सामना कर रहे सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया। 16 सितंबर को दोषियों की सजा पर फैसला होना है। अदालत के इस फैसले से मामले में चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत जरूर हुआ है, लेकिन झीरम की पूरी कहानी अभी भी कई सवालों के साथ खड़ी है। हमला किसने किया और मुकदमे में आरोपी बनाए गए लोगों की भूमिका क्या थी, इस सवाल पर अदालत का फैसला सामने आ चुका है।

लेकिन क्या हमले के पीछे कोई बड़ी राजनीतिक साजिश थी?

क्या सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक हुई थी? हमले की पूरी योजना कैसे बनी और इतने बड़े राजनीतिक काफिले पर हमला होने से पहले सुरक्षा तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? इन सवालों के अंतिम और सर्वमान्य जवाब अब भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा हैं। 25 मई 2013 को परिवर्तन यात्रा के दौरान झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा समेत कई नेताओं और सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी। घटना के बाद राज्य पुलिस की जांच के साथ मामला एनआईए को सौंपी गई।

झीरम को लेकर राजनीतिक सवाल भी गहराते गए

एनआईए ने 2014 में चार्जशीट और बाद में सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश की। इसी दौरान झीरम को लेकर राजनीतिक सवाल भी गहराते गए। घटना की न्यायिक जांच के लिए आयोग गठित हुआ। लंबे समय बाद आयोग ने नवंबर 2021 में अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी। इसके बावजूद रिपोर्ट को लेकर उठे सवालों पर राजनीतिक बहस खत्म नहीं हुई। 2019 में कांग्रेस सरकार ने बड़ी साजिश के पहलू की जांच के लिए एसआईटी गठित की। एसआईटी ने बयान दर्ज किए, लेकिन एनआईए से दस्तावेज हासिल करने और जांच के अधिकार को लेकर विवाद खड़ा हो गया। मामला अदालत तक पहुंचा और एसआईटी की जांच भी कानूनी पेचीदगियों में उलझती रही।

झीरम की जांच अब दो अलग-अलग सवालों में बंटी

झीरम की जांच अब दो अलग-अलग सवालों में बंट चुकी है। पहला हमले में कौन शामिल था और आरोपियों की भूमिका क्या थी? इस पर एनआईए कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। दूसरा क्या नक्सली हमले के पीछे घोषित रणनीति के अलावा कोई बड़ी राजनीतिक साजिश, सुरक्षा चूक या अन्य व्यापक परिस्थितियां भी थीं? इस सवाल पर राजनीतिक दलों और पीड़ित परिवारों की ओर से समय-समय पर जांच की मांग उठती रही है।

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई

झीरम घटना के तुरंत बाद राज्य सरकार ने न्यायिक जांच आयोग गठित किया था। लंबे समय तक चली प्रक्रिया के बाद आयोग ने नवंबर 2021 में अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी। आयोग की जांच में बड़ी संख्या में गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे। लेकिन आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद भी झीरम को लेकर उठे तमाम सवालों का राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर कोई ऐसा निष्कर्ष नहीं आया, जिस पर सभी पक्ष सहमत हों। यही वजह है कि झीरम की जांच की कहानी में एक रिपोर्ट के बाद दूसरी जांच और एक जांच के बाद दूसरी राजनीतिक बहस जुड़ती चली गई।

एसआईटी बनी, बयान हुए… फिर जांच अटकी…

2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने झीरम की घटना की व्यापक जांच के लिए एसआईटी गठित की। एसआईटी ने मामले में लोगों के बयान दर्ज किए और जांच आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन एनआईए से दस्तावेज हासिल करने और जांच के अधिकार को लेकर विवाद न्यायालय तक पहुंच गया। बाद में एसआईटी की जांच भी कानूनी पेचीदगियों में उलझी रही। यही वह वजह है जिसके चलते झीरम की जांच का दूसरा पहलू उस गति से आगे नहीं बढ़ सका, जैसी राजनीतिक और पीडि़त परिवारों की अपेक्षा थी।

नए जांच आयोग का मामला भी हाईकोर्ट में

झीरम के व्यापक पहलुओं की जांच के लिए गठित नए जांच आयोग को लेकर भी विवाद समाप्त नहीं हुआ है। आयोग की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लंबित है। 3 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई दो सप्ताह के लिए टाल दी गई। यानी जिस समय आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि हो चुकी है, उसी समय झीरम से जुड़े दूसरे पहलुओं की जांच का कानूनी रास्ता अब भी स्पष्ट नहीं है। 13 साल की जांच के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अदालत का यह फैसला झीरम के ‘पूरे सच’ तक पहुंचने की शुरुआत बनेगा, या फिर राजनीतिक साजिश और सुरक्षा चूक जैसे सवाल भी फाइलों और बहसों में ही दफन रह जाएंगे।

जांच का सफर

2013-मामला एनआईए को सौंपा गया
2014-एनआईए की पहली चार्जशीट
2015 -सप्लीमेंट्री चार्जशीट
2019 -भूपेश सरकार में एसआईटी का गठन
2021 - न्यायिक आयोग की रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी
अगस्त 2026-एनआईए कोर्ट में अंतिम बहस पूरी
5 सितंबर 2026-सभी 10 ट्रायल आरोपियों को दोषी करार
16 सितंबर 2026 — सजा पर फैसला प्रस्तावित