
आदिवासी बच्चों की थाली में सेंध (Photo Source- Patrika)
Bastar Ashram Hostel: आदिवासी विकास विभाग के आश्रमों और छात्रावासों में रहने वाले बच्चों की सुविधाओं और सुरक्षा को लेकर शासन भले ही बड़े दावे करे, लेकिन अंदरूनी इलाकों के आश्रमों की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। पत्रिका की टीम ने लोहांडीगुड़ा और बस्तर ब्लॉक के अंदरूनी क्षेत्रों में संचालित आश्रमों का जायजा लिया तो बच्चों के भोजन से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों और रात की सुरक्षा व्यवस्था तक कई स्तरों पर अव्यवस्था सामने आई।
आश्रमों में बच्चों के लिए सात दिनों के हिसाब से भोजन का मेनू निर्धारित है। इसका उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक और संतुलित भोजन उपलब्ध कराना है। लेकिन पड़ताल में यह सवाल सामने आया कि क्या निर्धारित मेनू के मुताबिक वास्तव में बच्चों की थाली तक भोजन पहुंच रहा है? ककनार, चंदेला और महिमा आश्रम को लेकर स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाओं और बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं पर सवाल उठ रहे हैं। यदि मेनू केवल कागजों तक सीमित रह जाए तो इसका सीधा असर उन बच्चों पर पड़ता है, जिनके लिए शासन यह व्यवस्था संचालित कर रहा है।
मामला सिर्फ भोजन तक सीमित नहीं है। बच्चों को उपलब्ध कराई जाने वाली रोजमर्रा की जरूरी सामग्री साबुन, तेल और टूथपेस्ट आदि को लेकर भी हर महीने कटौती के आरोप सामने आ रहे हैं। सवाल यह है कि बच्चों के नाम पर जारी होने वाली सामग्री की वास्तविक मात्रा क्या है और उसका इस्तेमाल कहां हो रहा है? इन सामानों के वितरण और स्टॉक का नियमित भौतिक सत्यापन कितना होता है, यह भी जांच का विषय है।
पत्रिका ने पड़ताल में पाया कि ककनार, चंदेला और महिमा आश्रम के बच्चे बदबूदार और फटे गद्दे में सोने को मजबूर हैं। जबकि हर आश्रम को समय-समय पर नए गद्दे और चादर के साथ कंबल दिए जातेे हैं। बच्चों ने बताया कि लंबे वक्त से उन्हेंं यह सब नहीं दिया गया है।
हाल ही में शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने बस्तर के आश्रम-छात्रावासों में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया था। इसके बावजूद यदि अंदरूनी आश्रमों में जिम्मेदार अधिकारियों की रात में मौजूदगी और व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो यह विभागीय मॉनिटङ्क्षरग पर गंभीर प्रश्न है। अब जरूरत सिर्फ निरीक्षण की नहीं, बल्कि औचक जांच, स्टॉक का भौतिक सत्यापन और रात में अधिकारियों की मौजूदगी की वास्तविकता जांचने की है।
आश्रमों की सबसे गंभीर तस्वीर रात की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आती है। कई बालक आश्रमों में शाम ढलने के बाद अधीक्षक की भूमिका बदल जाती है। जिम्मेदार अधिकारी की मौजूदगी के बजाय चौकीदार और चपरासी जैसी व्यवस्थाओं के भरोसे आश्रम छोड़ दिए जाने की स्थिति बनती है। कई आश्रमों में रात के समय अधीक्षक के नदारद रहने की बात भी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि रात में किसी बच्चे की तबीयत बिगड़ जाए, कोई दुर्घटना हो जाए या सुरक्षा से जुड़ी आपात स्थिति पैदा हो जाए तो तत्काल निर्णय कौन लेगा? आश्रम में रहने वाले बच्चों की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
Updated on:
08 Sept 2026 01:15 pm
Published on:
08 Sept 2026 01:03 pm
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