
Krishna Janmashtami 2024 : जयपुर। गुलाबी नगरी जिसे छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है, न केवल अपनी सुंदरता और राजसी इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां स्थित अद्भुत और प्राचीन मंदिरों के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं मंदिरों में से एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक स्थल है चरण मंदिर। इसी वजह से इस मंदिर का नाम 'चरण मंदिर' रखा गया है। जयगढ़ किले से नाहरगढ़ किले पर जाने वाले पहाड़ी रास्ते पर स्थित है। है। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के चरण चिन्हों के कारण विशिष्ट महत्व रखता है और इस मंदिर की प्राचीनता द्वापर युग से जुड़ी हुई है।
महंत सुरेश पारीक ने बताया कि चरण मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की पूजा नहीं की जाती, बल्कि उनके दाहिने पैर के चरण चिन्ह की पूजा की जाती है। यह चरण चिन्ह सफेद रंग के एक पत्थर पर अंकित है और मंदिर का नाम भी इन्हीं चरण चिन्हों के आधार पर रखा गया है। यह देश का अकेला ऐसा मंदिर है जहां भगवान श्रीकृष्ण के चरण चिन्ह और उनकी गायों के खुरों के निशान आज भी श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं।
माना जाता है कि द्वापर युग में जब श्रीकृष्ण अपने प्रिय पाण्डवों से अज्ञातवास और वन गमन के दौरान मिलने आए थे, तब उन्होंने इसी स्थल पर अपने चरण रखे थे। जयगढ़ किले से नाहरगढ़ किले की ओर जाने वाले पहाड़ी मार्ग पर स्थित इस मंदिर के आसपास का क्षेत्र तब अम्बिका वन के नाम से जाना जाता था। लोक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने यहां ग्वालों और नंदबाबा के साथ समय बिताया था। यह वही स्थान है जहां नंदबाबा को एक अजगर ने पकड़ लिया था और भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अजगर से मुक्त कराया था।
युवाचार्य कपिल पारीक ने बताया कि भागवत पुराण में वर्णित है कि अम्बिका वन में नंदबाबा को पकड़ने वाला अजगर वास्तव में इन्द्र का पुत्र सुदर्शन था, जिसे ऋषियों ने श्राप देकर अजगर बना दिया था। जब श्रीकृष्ण ने उसे मुक्त किया, तो सुदर्शन अपने असली रूप में वापस आ गया। इस पौराणिक घटना की स्मृति में नाहरगढ़ पहाड़ी पर स्थित चरण मंदिर के नीचे सुदर्शन की खोळ और नाहरगढ़ में सुदर्शन मंदिर का निर्माण किया गया, जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं।
पंद्रहवीं शताब्दी में आमेर के नरेश महाराजा मानसिंह प्रथम ने चरण मंदिर को भव्य रूप प्रदान किया। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्व के कारण भी यह जयपुर की धरोहरों में शामिल है। सवाई जयसिंह द्वितीय ने नाहरगढ़ पहाड़ी पर सुदर्शन गढ़ के नाम से किला बनवाना शुरू किया था, जिसे बाद में नाहरगढ़ के नाम से जाना गया।
चरण मंदिर के नीचे स्थित सुदर्शन की खोळ के पास आज भी कदम्ब के हजारों पेड़ हैं, जो श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े हुए माने जाते हैं। यहां स्थित कदम्ब कुंड इन पेड़ों से घिरा हुआ है, और यह स्थल भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता का प्रतीक है।
Updated on:
24 Aug 2024 03:23 pm
Published on:
24 Aug 2024 01:58 pm
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