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JLF 2026: एल्गोरिदम, प्यार और पहचान- जेन जी के दौर की उलझनों पर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मंथन

Jaipur Literature Festival: सच अब तथ्य नहीं, मूड बन गया है, डिजिटल दुनिया में रिश्ते, कंज्यूमर कल्चर और पीढ़ियों के फर्क पर खुलकर बोले वक्ता।

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कार्यक्रम को संबोधित करते वक्ता। फोटो- पत्रिका

जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन चारबाग में आयोजित सत्र 'Gen Z, the Millennials and Mummyji' में डिजिटल संस्कृति के प्रभावों पर चर्चा हुई। सत्र में वक्ताओं ने बताया कि इंटरनेट और सोशल मीडिया ने लोगों को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन इसके साथ ही समाज में ध्रुवीकरण, भ्रम और असहमति से बचने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है।

पहचान अब विचारों से कम और प्रस्तुति से ज्यादा बन रही है, जबकि प्यार और रिश्ते नए माध्यमों के कारण अलग भाषा और अलग नियमों में ढल रहे हैं। सत्र में लेखक और सांस्कृतिक टिप्पणीकार अनुराग माइनस वर्मा, सामाजिक विचारक संतोष देसाई और लेखिका रिया चोपड़ा ने अपने विचार रखे। बातचीत का संचालन चिराग ठक्कर ने किया।

सच, एल्गोरिदम और इको चैंबर : तथ्य भी मान्यता बनकर लौटता है

चर्चा की शुरुआत इस सवाल से हुई कि आज इंटरनेट पर हम 'सच' को कैसे देखते हैं। वक्ताओं ने कहा कि आज तथ्य इस तरह पेश किए जाते हैं कि वे धीरे-धीरे व्यक्ति की मान्यता बन जाते फिर वही मान्यता तथ्य की तरह स्थापित हो जाती है। वक्ताओं के अनुसार, इसका बड़ा कारण एल्गोरिदम है। एल्गोरिदम व्यक्ति को वही दिखाता है जो वह पहले से पसंद करता है। किसी वीडियो या विचार को पसंद करने का मतलब यह हो जाता है कि आगे भी उसी तरह की बातें दिखाई जाएंगी। यह सिलसिला इको चैंबर बनाता है, जहां व्यक्ति बार-बार अपने ही विचारों की पुष्टि देखता है।

वक्ताओं ने यह भी कहा कि एआई का असर इस प्रक्रिया को और तेज करता है। एआई अगर हर बात पर सहमति जताता रहे, तो व्यक्ति धीरे-धीरे असहमति रहित दुनिया में रहने लगता है, लेकिन जैसे ही वह डिजिटल दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में आता है, उसे अलग राय वाले लोग मिलते हैं, अलग अनुभव मिलते हैं और सच के अलग-अलग संस्करण सामने आते हैं।

इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि सबसे बड़ा नुकसान यह है कि 'मैं गलत भी हो सकता हूं' या "मैं असहमत हो सकता हूं" वाली क्षमता कमजोर हो रही है। ऑनलाइन बहसों में अक्सर लोग या तो एक-दूसरे को कैंसल कर देते हैं, ब्लॉक कर देते हैं। इससे इको चैंबर और मजबूत होता है, और एक खंडित वास्तविकता बनती है, जिसे वक्ताओं ने 'फॉक्स ट्रुथ" कहा।

पहले सच संस्थानों से आता था, अब सच एक वाइब है- संतोष देसाई

सच और भरोसे की बदलती प्रकृति पर सामाजिक विचारक संतोष देसाई ने कहा कि पहले उनकी पीढ़ी सच को संस्थानों के माध्यम से देखती थी। बाद की पीढ़ी ने संस्थानों पर शक करना शुरू किया और लोगों को अधिक भरोसेमंद माना, लेकिन अब हम ऐसे दौर में पहुंच रहे हैं, जहां सच किसी ठोस आधार के बजाय 'वाइब' 'मूड'और "एंबिएंट" जैसा बन गया है।

उन्होंने कहा कि हैरानी की बात यह है कि लोग कंटेंट बनाने वाले व्यक्ति पर तो सवाल उठाते हैं, लेकिन एल्गोरिदम पर सवाल नहीं उठाते। कोई यह नहीं पूछता कि 'मुझे यह कंटेंट क्यों दिखाया जा रहा है' 'मेरी टाइमलाइन किस आधार पर तय हो रही है', या “मेरी सोच किन चीजों से आकार ले रही है।

प्यार वही है, बदल गई है भाषा और माध्यम- रिया चोपड़ा

रिया चोपड़ा ने कहा कि प्यार की भावना नहीं बदली है। लोग आज भी प्यार चाहते हैं, महसूस करते हैं, लेकिन उसे व्यक्त करने का माध्यम और भाषा बदल गई है। उन्होंने कहा कि डेटिंग ऐप्स के कारण विकल्प बढ़ गए हैं। अब लोग पहले से ज्यादा पार्टनर्स तक पहुंच सकते हैं। रिश्तों के स्वरूप भी विविध हुए हैं। मोनोगैमी अब एकमात्र विकल्प नहीं रह गई है। अलग तरह के रिश्तों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति बढ़ी है और कानूनी स्तर पर भी कुछ बदलावों की चर्चा होती रही है, हालांकि वहां अभी भी कई समस्याएं हैं।

एक दिलचस्प बदलाव यह है कि आज की युवा पीढ़ी पहले से ज्यादा कंजर्वेटिव दिखाई दे रही है। आंकड़ों और माहौल से यह संकेत मिलता है कि युवा लोग राजनीतिक रूप से भी और यौन-रोमांटिक दृष्टि से भी अधिक कंजर्वेटिव हो रहे हैं। उनके मुताबिक, इसकी एक वजह यह है कि दुनिया अब ज्यादा असुरक्षित और कठिन लगती है।

आर्थिक अनिश्चितता, करियर का दबाव, भविष्य की चिंता और लगातार चलती 'परमाक्राइसिस' की स्थिति ने युवाओं को थका दिया है। इसलिए कई लोग प्यार और रिश्तों को प्राथमिकता से हटाकर स्थिरता और करियर को पहले रख रहे हैं। अनुराग माइनस वर्मा ने ऑनलाइन जेंडर टेंशन की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि रेडिट, ट्विटर जैसी जगहों पर पुरुषों के कुछ समूहों में दूसरे जेंडर के बारे में बहुत कठोर और नफरत भरी भाषा दिखती है। स्वस्थ ऑफलाइन संवाद कम होता जा रहा है और केवल ऑनलाइन इंटरैक्शन से जेंडर के बीच दूरी बढ़ रही है, जो रिश्तों की समझ को और उलझाता है।

अनुराग ने यह भी कहा कि हम खुद को जितना प्रगतिशील मानते थे, उतने शायद थे नहीं। डेटिंग ऐप्स ने भले अलग जाति-वर्ग के लोगों तक पहुंच बढ़ाई, लेकिन शादी के आंकड़े बताते हैं कि आज भी ज्यादातर शादियां अपने ही समूह के भीतर हो रही हैं। माता-पिता की पसंद और सामाजिक स्वीकृति अब भी रिश्तों का बड़ा निर्धारक है।

समाज का एल्गोरिदम आज भी तय करता है स्वीकृति- अनुराग माइनस वर्मा

अनुराग माइनस वर्मा ने कहा कि डिजिटल आत्मनिर्भरता के बावजूद समाज के बुनियादी ढांचे बहुत नहीं बदले हैं। छोटे शहरों में आज भी डेटिंग ऐप्स को शक की नजर से देखा जाता है, जबकि शादी डॉट कॉम जैसे प्लेटफॉर्म सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाते हैं।


उन्होंने कहा कि चाहे आप किसी भी ऐप पर किसी से मिलें, अंत में आपको उसी सामाजिक एल्गोरिदम से गुजरना पड़ता है, परिवार, जाति, वर्ग और स्वीकृति। यह दिखाता है कि ऑनलाइन आत्मनिर्भरता की सीमा आखिरकार ऑफलाइन सामाजिक व्यवस्था तय करती है।


उन्होंने इंटरनेट को लेकर यह भी कहा कि पहले इसे बराबरी का मंच माना गया था, लेकिन ऑनलाइन दुनिया ने ऑफलाइन की हायरार्की को ही दोहरा दिया। जाति, वर्ग, स्त्री-विरोध और असमानता इंटरनेट पर भी उतनी ही मजबूती से मौजूद हैं, कई बार और ज्यादा उग्र रूप में।

अनुराग ने कहा कि जेन जी पर ट्रेंड फॉलो करने का भारी दबाव है। वे अक्सर खुद निर्णय नहीं लेते, ऑनलाइन दबाव उनके लिए निर्णय लेता है , क्या पहनना है, कहां जाना है, कैसा कैप्शन डालना है, कौन-सी चीज 'cool' मानी जाएगी। इसी संदर्भ में उन्होंने जेन जी को 'कल्चरल मंदस' कहा।


जाति के संदर्भ में उन्होंने यह भी बताया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नई तरह की जातिगत पहचानें और मिथक गढ़े जा रहे हैं। अलग-अलग जातियां ऑनलाइन वीडियो, गीत और मीम्स के जरिए अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने इसे डिजिटल जाति पुराण की तरह बताया, जो इंटरनेट पर तेजी से फैल रहा है।

'पहचान अब पिक्सल बन गई है'

उपभोक्तावाद और पहचान पर संतोष देसाई ने कहा कि आज हर व्यक्ति खुद को लगातार प्रस्तुत कर रहा है। उनके मुताबिक पहले किसी को इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि आप कौन हैं, लेकिन आज हर व्यक्ति को रोज़ खुद को साबित करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि पहचान अब पिक्सलेटेड हो गई है और पहचान का हर पिक्सल व्यक्ति के छोटे-छोटे चुनाव हैं, क्या पहनते हैं, क्या खरीदते हैं, क्या पोस्ट करते हैं, कहां जाते हैं। इसी वजह से हम खुद को लगातार बना और दोबारा बना रहे हैं, जैसे हम जीवन भर अपने ही बीटा वर्जन में जी रहे होंप्ज। उन्होंने जॉन बर्जर का संदर्भ देते हुए कहा कि उत्पाद हमारे आत्म-प्रेम को संबोधित करते हैं और फिर उसी आत्म-प्रेम को हमें कीमत पर वापस बेचते हैं। इसीलिए उत्पादों की भूमिका कभी खत्म न होने वाली बन जाती है।

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'टोट बैग, ब्रांड और 'बाय नाउ, पे लेटर' से बन रही पहचान'

रिया चोपड़ा ने कहा कि आज की पीढ़ी में उपभोक्तावाद केवल जरूरत नहीं रहा, वह पहचान का जरिया बन गया है। लोग कपड़ों, जूतों, टोट बैग और ब्रांड्स से यह संकेत देते हैं कि वे किस तरह के इंसान हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 'बाय नाउ, पे लेटर' जैसी योजनाओं और आसान क्रेडिट ने खर्च करना सरल बना दिया है। युवा पीढ़ी कॉन्सर्ट टिकट और खरीदारी तक ईएमआई पर कर रही है। लेकिन यह चलन पर्यावरण और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंता का विषय है।

उन्होंने टोट बैग संस्कृति का उदाहरण देते हुए कहा कि हर ब्रांड टोट बैग दे देता है, लोग उसे पहचान की तरह इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह भी आखिरकार लैंडफिल में जाता है और कई बार वह ऑर्गेनिक नहीं, बल्कि पॉलिमर आधारित सामग्री से बना होता है।

सत्र के अंत में वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल दुनिया ने अभिव्यक्ति का मंच तो दिया, लेकिन उसके साथ सच, रिश्ते और पहचान पहले से कहीं अधिक उलझ गए हैं। एल्गोरिदम के कारण ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, असहमति से बचने की प्रवृत्ति मजबूत हो रही है और उपभोक्तावाद पहचान का विकल्प बनता जा रहा है। वक्ताओं के अनुसार, जरूरत इस बात की है कि तकनीक के साथ-साथ समाज भी आत्ममंथन करे, एल्गोरिदम को समझे और मानवीय संवाद को फिर से केंद्र में लाए।

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