
चूरू। राजस्थान का संभवतया यह पहला ही गांव है, जहां एक भी मुस्लिम नहीं है, मगर 1500 वर्ष से अधिक पुरानी पीर की दरगाह में हिन्दूजन आज भी पूरी शिद्दत से इबादत करते हैं। हम बात कर रहे हैं गंगा-जमुनी तहजीब को सहेज रहे चूरू जिले के गांव घंटेल की। चूरू जिला मुख्यालय के पंखा सर्किल से करीब छह किमी दूर स्थित इस गांव के हिन्दू लोगों में पीर के प्रति मुस्लिमजनों के समान ही आस्था है।
हर शुक्रवार को यहां लगने वाले मेले में हिन्दू-मुस्लिमजन यहां आकर मन्नत मांगते हैं। दरगाह की देखरेख करने वाले गांव के ही संतलाल महाब्राह्मण बताते हैं कि करीब 70 फीट से अधिक ऊंचे टीले पर स्थित इस दरगाह के नीचे सड़क के बराबर पीर की मजार थी।
कालांतर में पुरानी मजार नीचे दबती चली गई। इस पर एक के ऊपर एक पीर की मजारें बनती चली गई। वर्तमान में गांव के ही लोग आपस में राशि एकत्रित कर दरगाह की चारदीवारी व अन्य निर्माण कार्य करवा रहे हैं।
अब तक डेढ़ लाख रुपए एकत्रित कर चुके हैं। निर्माण कार्य चल रहा है। बारिश नहीं होने पर खोदते हैं मिट्टी लोगों की मान्यता है कि आज भी किसी घर में आग लगती है तो पीर की कृपा दृष्टि से आग कभी दूसरे घर में नहीं फैलती है।
गांव में जिस साल बारिश नहीं होती है तो गांव के लोग दरगाह के पास हाथ से मिट्टी खोदते हैं। तो कुछ ही दिनों में बारिश हो जाती है। पीर के बारे में मान्यता है कि गांव वालों को पीर का नाम तो नहीं पता, मगर यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि एक हजार से अधिक वर्ष पहले हुए किसी युद्ध के दौरान पांच योद्धा लड़ते हुए जोधपुर से रवाना हुए।
चूरू जिले के गांव घंटेल आकर एक योद्धा युद्ध में काम आ गए। जिनकी ये मजार दरगाह के रूप में आज यहां स्थापित है। एक पीर की मजार झुंझुनूं जिले के नरहड़ में है। गांव घंटेल के पीर नरहड़ के पीर के बड़े भाई थे। इसलिए यहां के पीरे में मान्यता रखने वाले जब नरहड़ जाते हैं तो वहां के लोग कहते हैं कि थे अठै आवो ही क्यूं हो। अठै सै बड़ा पीर तो थारै कन्नै बैठ्या है।
गांव घंटेल के नामकरण की कहानी
- गांव घंटेल के नामकरण के बारे में लोगों की मान्यता है कि करीब 1700 वर्ष पहले यहां मोयल चौहान आकर बसे थे। उस समय यहां सात बास (मोहल्ले) होते थे। किसी प्राकृतिक आपदा के कारण तीन मोहल्ले खत्म हो गए और चार बास रह गए। जो आज भी हैं। बास घटने पर गांव का नाम घंटेल पड़ा।
-इसके अलावा लोगों का कहना है कि यहां घंटेलिया ब्राह्मण आकर बसे थे। उसके बाद घिंटाला प्रजापत जाति के लोग आकर बसे। जिस पर गांव का नाम घंटेल पड़ा।
चूरू से पहले घंटेल में आई बिजली
चूरू से पहले आई गांव में बिजली गांव के लोग बताते हैं कि गांव के सबल सिंह बीकानेर रियासत के राजा गांगासिंह के बड़े अफसर थे। उनके पुत्र पृथ्वीसिंह राठौड़ तात्कालीन राजस्थान राज्य विद्युत मंडल में चीफ इंजीनियर थे। उन्होंने चूरू से पहले अपने गांव में बिजली की आपूर्ति शुरू करवाई। गांव का पहला बिजली कनेक्शन यहां छत्तू सिंह की आटा चक्की में हुआ था।
विकास की डगर पर है गांव घंटेल
करीब 1700 घरों की आबादी के इस गांव की जनसंख्या करीब पांच हजार से अधिक है। यहां सड़क, बिजली, पानी, पानी निकासी, मोबाइल, चिकित्सा व शिक्षा की सुविधाएं मौजूद हैं। गांव के ओमप्रकाश ने बताया कि गांव में इन वर्षों में अच्छा विकास हुआ है। बिजली आपूर्ति भी सही है। कुछ एक सड़कें हैं जो बननी शेष हैं।
गांव की कहानी, लोगों की जुबानी
गांव में एक भी मुस्लिम नहीं है। मगर पीर के प्रति आस्था के कारण पूरा गांव इन्हें मानता है। अब गांव के लोग आपस में रुपए एकत्रित कर दरगाह की चारदीवारी बनवा रहे हैं।
एडवोकेट रतन बरोला, घंटेल, चूरू
दरगार के नीचे सड़क के बराबर पीर की दरगाह है। रेत का टील बनते रहने से वो नीचे दब गई। आज उसी स्थान पर पीर की दरगाह है। शुक्रवार को यहां मेला लगता है।
-संतलाल महाब्राह्मण, घंटेल, चूरू
पीर की दरगाह घंटेल गांव में गत वर्षों में काफी विकास हुआ है। बिजली, पानी, शिक्षा की कोई कमी नहीं है। कुछ एक गलियों में सड़क बननी बाकी है। बिजली कटौती बहुत ही कम होती है।
-ओमप्रकाश, दुकानदार, घंटेल, चूरू
गांव घंटेल गांव में चूरू से भी पहले बिजली आई थी। जो गांव के पृथ्वीसिंह राठौड़ लाए थे। पहला कनेक्शन छत्तूसिंह की आटा चक्की पर हुआ था। तब बहन की शादी में यहां से बिजली ली थी।
-सांवरमल चौहान, दुकानदार गांव घंटेल, चूरू
Published on:
27 Jul 2018 06:26 pm
