
यशवीर सिंह (पत्रिका फोटो)
-आरिफ खान
TC Yashveer Singh Commonwealth Games: जयपुर: मेहनत और हौसले के सामने आखिरी मौका भी इतिहास बन सकता है। जयपुर रेलवे के टिकट क्लर्क (टीसी) यशवीर सिंह ने ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में यही साबित किया। शुरुआती पांच प्रयासों तक पदक की दौड़ से बाहर चल रहे यशवीर ने छठे और अंतिम प्रयास में 85.41 मीटर का भाला फेंककर पूरा मुकाबला पलट दिया। इस थ्रो के साथ उन्होंने कांस्य पदक जीता और अपना पुराना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 83.72 मीटर का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया।
यह उपलब्धि इसलिए भी खास रही, क्योंकि यशवीर ने पूर्व विश्व चैंपियन एंडरसन पीटर्स और मौजूदा ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अरशद नदीम जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ते हुए पोडियम पर जगह बनाई। कॉमनवेल्थ में पदक जीतने के बाद यशवीर ने पत्रिका से बातचीत में कहा, आखिरी थ्रो से पहले मुझे खुद पर पूरा भरोसा था। शुरुआती पांच प्रयास उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, लेकिन मैंने फोकस नहीं खोया। आखिरी मौका था और मैंने अपना पूरा दम लगा दिया। जैसे ही भाला 85 मीटर के पार गया, मुझे विश्वास हो गया कि कुछ बड़ा हो गया है।
मूल रूप से हरियाणा के भिवानी निवासी यशवीर सिंह ने बताया कि उनके खेल जीवन की शुरुआत जयपुर रेलवे कॉलोनी से हुई। पिता भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं और उनकी पोस्टिंग जयपुर होने के कारण परिवार यहीं आ गया। वे जयपुर रेलवे में कंप्लेंट इंचार्ज हैं। यशवीर ने बताया कि जैवलिन थ्रो की प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली। मेरे पिता खुद अच्छे जैवलिन खिलाड़ी रहे हैं।
उन्हें देखकर ही मैंने यह खेल अपनाया। शुरुआती दिनों में उन्होंने ही तकनीक और खेल की बारीकियां सिखाईं। रेलवे ग्राउंड में पिता के साथ अभ्यास करते हुए मेरे सफर की शुरुआत हुई। उन्होंने बताया कि पिछले सात वर्षों से वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने के लक्ष्य के साथ लगातार मेहनत कर रहे थे।
यशवीर के करियर में कठिन दौर भी आया। एक हादसे में चोट लगने के कारण उन्हें करीब छह महीने तक खेल से दूर रहना पड़ा। उन्होंने कहा, उस समय काफी निराशा हुई थी, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। रिकवरी पर पूरा ध्यान दिया और खुद से वादा किया कि मजबूत वापसी करूंगा और उसके बाद दमदार वापसी की।
यशवीर ने बताया कि पढ़ाई में उनकी ज्यादा रुचि नहीं थी। पिता चाहते थे कि वे खेल के जरिए अपना भविष्य बनाएं। उन्होंने कहा, पिता हमेशा कहते थे कि अच्छा खिलाड़ी बनोगे तो जीवन में आगे बढ़ोगे। मैंने उनकी बात को गंभीरता से लिया और खेल को ही अपना लक्ष्य बना लिया। जब मैंने नीरज को भारत के लिए पदक जीतते देखा, तभी तय कर लिया था कि एक दिन मैं भी देश के लिए मेडल जीतूंगा और तिरंगा ऊंचा करूंगा।
Updated on:
02 Aug 2026 08:46 am
Published on:
02 Aug 2026 08:27 am
