
Meaning of Pongal Importance of Making Kheer on Pongal 2021
जयपुर. जैसे उत्तर भारत में मकर संक्रांति की धूम मचती है वैसे ही दक्षिण भारत में पोंगल पर्व मनाया जाता है। लोहड़ी और मकर संक्रांति जैसे ही यह भी खुशियों का त्योहार है। दक्षिण में इन दिनों धान की फसल काटी जाती है जिसके कारण यह उत्सव मनाते हैं। इस पर्व के दौरान इन्द्र, सूर्यदेव और वरुण देव के साथ ही मवेशियों की भी पूजा की जाती है। ईश्वर से फसल अच्छी होने की प्रार्थना की जाती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित जीके मिश्र के मुताबिक पोंगल अर्थात खिचड़ी का त्योहार। समृद्धि की कामना करते हुए यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने के पुण्यकाल में मनाया जाता है। मकर संक्रांति के जैसे ही पोंगल भी मुख्यत: सूर्योपासना का पर्व है। इस दिन सूर्यदेव को भोग लगाने के लिए चावल, दूध, घी और शकर से विशेष पकवान तैयार किया जाता है।
पोंगल के पहले पौष अमावस्या पर बुराइयां छोड़ने का संकल्प व्यक्त किया जाता है। इसे पोही कहते हैं। पोही के अगले दिन पौष शुक्ल प्रतिपदा को पोंगल मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इस पर्व को दिवाली के जैसे बहुत धूम-धाम से मनाते हैं। पोंगल दरअसल 4 दिवसीय उत्सव है। इसके पहले दिन भोगी, दूसरे दिन सूर्य, तीसरे दिन मट्टू और चौथे दिन कन्या पोंगल मनाया जाता है।
सभी अन्य तीज—त्योहारों के जैसे ही इस त्योहार पर भी कई पकवान बनाते हैं। पोंगल पर मिष्ठान्न के साथ ही मसालेदार पकवान भी बनाए जाते हैं। पोंगल महापर्व खासतौर पर स्वादिष्ट और लजीज खीर के लिए जाना जाता है। इस पर्व पर गाय के दूध को उबालने की बहुत अहमियत होती है। दरअसल पोंगल का तमिल में अर्थ ही होता है— विप्लव या उफान।
Published on:
14 Jan 2021 05:48 pm
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