
विशाल सूर्यकांत
देश में ब्लू व्हेल जैसे खतरनाक और जानलेवा मोबाइल गेम्स का चलन बढ़ रहा है। जुलाई,2017 में दुनिया में सबसे ज्यादा भारत में ब्लू व्हेल मोबाइल गेम सर्च किया गया। रोज़ का एक चेलेंज और आखिरी 50 वें दिन सुसाइड चेलेंज। आखिर कैसे एक मोबाइल गेम दिमाग पर इतना हावी हो सकता है कि लोग, खासकर बच्चे अपनी जान दे रहे हैं। कैसे बचाएं अपने बच्चों को ऐसे खतरनाक मोबाइल गेम्स से ? अगर ये चिंता आपके भी मन में है तो साइबर एक्सपर्ट,समाजशास्त्री,चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट और कानून के जानकार के साथ जरूर जुड़िए पत्रिका प्राइम टाइम डिबेट में ...
ब्लू व्हेल गेम का शिकार होकर आत्महत्या करने की कोशिश करने का ताजा मामला जोधपुर का है। 21 साल की एक युवती आखिर पड़ाव पर अपनी जान दे रही थी लेकिन उसे बचा लिया गया। इससे पहले मध्यप्रदेश के दमोह में 11 वीं क्लास के बच्चे सात्विक ने गेम के आखिरी स्टेज में दिए टास्क को इस रूप में पूरा किया कि ट्रेन के सामने बैठकर अपनी जान दे दी। कुछ दिनों पहले जयपुर के एक बच्चे को मुंबई से वापस लाया गया जो कि लास्ट टास्क को पूरा करने जयपुर से मुंबई पहुंच चुका था। उसे मोबाइल गेम में एडमिन की ओर से मुंबई जाकर आत्महत्या करने का टास्क दिया गया था। ये भी कहा गया कि आत्महत्या से पहले वो अपनी आखिरी सेल्फी अपलोड करे।
दरअसल, इससे पहले दुनिया में पोकेमॉन गो गेम ने खासा हंगामा मचाया था। पोकेमॉन गो मोबाइल गेम जानलेवा नहीं था लेकिन इसकी लत ऐसी थी कि लोग कई महीनों तक काम-काज छोड़कर पोकेमॉन खोजते रहे। अब पोकेमॉन का चलन कम हुआ तो ख़तरनाक ब्लू व्हेल गेम सामने आ गया। इस देश में मोबाइल गेमिंग का कारोबार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि बाजार में रोमांच,रहस्य पैदा करने वाले नए गेम्स की भरमार हो चुकी है। इंटरनेट पर अश्लील कंटेट को रोकने में नाकामयाब रही सरकार के लिए ये चुनौती तो बिल्कुल नई सी है। किसी को समझ में नहीं आ रहा कि इस नई चुनौती से कैसे निपटें ? नए दौर की नई सामाजिक तकनीकी चुनौतियों का मुकाबला कैसे किया जाए। मोबाइल गेमिंग की दुनिया में सभी गेम खतरनाक नहीं, लेकिन बच्चों के लिए कौनसा गेम खतरनाक और जानलेवा है, ये कैसे तय हो ?
देखिए,कैसे खतरनाक है ब्लू व्हेल गेम ...इस वीडियो में
दरअसल,भारत में इंटरनेट की बढ़ती स्पीड़ के साथ मोबाइल गेमिंग का बाजार भी बढ़ रहा है। अनुमान है कि देश में मोबाइल गेमिंग बाजार 2022 में 40 करोड़ डालर के पार पहुंच सकता है। क्योंकि फ्रीमियम और वचुर्अल रीयल्टी गेम्स की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। फ्रीमियम मोबाइल,ऐसा कारोबारी मॉडल है जिसमें मूल सेवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं और ज्यादा आधुनिक फीचर्स के इस्तेमाल के लिए भुगतान जरूरी होता है। सीआईआई-टेकसाई की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में बीते साल मोबाइल गेमिंग से रेवेन्यू 26.58 करोड़ डालर रहा।
2017 में मोबाइल गेमिंग इण्डस्ट्री के 28.62 करोड़ डालर तक हो जाने के आसार है। देश में मोबाइल गेमर्स की संख्या 2015 में 19.8 करोड़ थी जबकि 2020 तक देश में 68.8 करोड़ मोबाइल गेमर्स होने की उम्मीद है। 2016 में भारत का गेमिंग बाजार 54.3 करोड़ डॉलर का था। 2022 तक इस कारोबार के 80.1 करोड़ डालर हो सकता है और 2030 तक 1.16 अरब का आंकड़ा भी पार कर लेगा। सवाल ये हैं कि तेजी से बढ़ते मोबाइल गेमिंग कारोबार में सरकार के हाथ में क्या ऐसी कानूनी चाबी है, जिसमें इस तरह से खतरों की तालाबंदी कर दी जाए। क्या हमारे सिस्टम में गेमिंग मॉनिटरिंग या एडवाइजरी देने वाली कोई ऑर्थोरिटी है ? क्या हमारे पास ऐसा सिस्टम, ऐसा नजरिया और अधिकार है कि जानलेवा गेम्स तैयार करने वालों पर कार्रवाई हो सके ?
इस वीडियो में देखिए समाजशास्त्री डॉ.प्रज्ञा शर्मा, साइबर एक्पर्ट आयुष भारद्वाज, चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट नेहा अग्रवाल और कानून के जानकार मुकेश शर्मा की क्या है राय
दरअसल, मोबाइल गेमिंग को लेकर फिलहाल रोक लगाने से ज्यादा कडी कार्रवाई करने की स्थिति में सरकार नहीं है। क्योंकि ब्लू व्हेल पर रोक लगा दी मगर इसके एपीके वर्जन इतने हो गए हैं कि अब साइबर अपराधी इस गेम का इस्तेमाल कर बच्चों को मानसिक रूप से परेशान कर आत्महत्या के लिए उकसा रहे हैं। ये खेल सीधे तौर पर मनोरंजन नहीं बल्कि मौत परोस रहे हैं। ( देश में महानगरों के नहीं छोटे शहरों और कस्बाई इलाक़ों तक मोबाइल गेमिंग का क्रेज बढ़ रहा है। अगर आपका बच्चा या कोई परिचित मोबाइल पर गेम खेलने में घंटो बीता रहा है तो सतर्क हो जाइए।
दरअसल, समस्या ये हैं कि देश में नई तकनीक बहुत बड़े फायदों के साथ साइड इफेक्ट्स भी लेकर आई है। सरकार के पास इससे निपटने की कोई पूर्व नियोजित रणनीति नहीं है। मोबाइल का उपयोग बढ़ा है। दुनिया में सबसे ज्यादा इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला देश भारत बन गया है।लेकिन साइबर सिक्यूरिटी में हमारे प्रावधान और जागरूकता का स्तर बेहद निचले पायदान पर है। एक एप डाउन लोड करने से पहले आपसे बकायदा परमिशन मांगी जाती है जिसमें कॉन्टेक्ट लिस्ट से लेकर मोबाइल कैमेरे का डेटा तक हथियाने का अधिकार हम खुद दे रहे हैं।
नई तकनीक के मामले में दिक्कत ये भी है कि बच्चे ज्यादा समझदार हैं और ज्यादातर बच्चे ही अपने मां-बाप को मोबाइल फोन चलाना सीखा रहे हैं। ये नया दौर है, समझिए, संभलिए...क्योंकि साइड इफेक्ट्स आम जिंदगी में दस्तक देने लगे है। मोबाइल गेमिंग में बच्चों के साथ एडमिन का वन टू वन कम्यूनिकेशन ही होता है। ऐसे में, आपके पास जागरूकता, सर्तकता और समझदारी की एक रास्ता है।
मगर ये भी ध्यान रखें कि ब्लू व्हेल के डर से अपने बच्चों के हाथों से मोबाइल फोन मत छीनिए। उन्हें समझाएं,बताएं कि ये सिर्फ एक गेम है। अगर आप भी मोबाइल गेमर है तो याद रखिए किसी भी खेल का दायरा मनोरंजन तक ही सीमित है। इसे जिंदगी का हिस्सा ना बनाएं। जिंदगी एक ही है और उस पर सिर्फ आपका ही नहीं, कई लोगों का वाजिब हक़ है। आपके बिना उनकी जिंदगी बेनूर है।
ब्लू व्हेल के खतरों से बच्चों को बचाए रखने के लिए दस बेहद आसान कदम

Published on:
05 Sept 2017 11:43 pm
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