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Rajasthan: मेडिकल कोर्स की फीस कंट्रोल का किसमें है दम…सरकार, एनएमसी, फीस कमेटी सब ‘बेदम’, जानें हकीकत

राज्य में सख्त कानून नहीं होने से निजी कॉलेज मेडिकल कोर्स की मनमाने तरीके से फीस वसूल रहे हैं और एमबीबीएस की पूरी पढ़ाई पर डेढ़ करोड़ रुपए तक का खर्च पहुंच गया है।

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जयपुर. देश के कई राज्यों में निजी मेडिकल कॉलेजों की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए राज्य सरकारों ने फीस नियामक कानून लागू कर रखे हैं। इन कानूनों के तहत एमबीबीएस सहित अन्य मेडिकल कोर्स की फीस का निर्धारण राज्य स्तर पर गठित कमेटियां करती हैं, जिससे छात्रों और अभिभावकों पर आर्थिक बोझ सीमित रहता है। राजस्थान में भी इसके लिए फीस नियामक कमेटी है। इसके बावजूद प्रदेश में भारी भरकम और आर्थिक कमजोर वर्ग के बच्चों की सीमा से बाहर फीस है। यह कमेटी भी निजी मेडिकल कॉलेजों की ही फीस तय करती है। निजी विश्वविद्यालय इस कमेटी के भी नियंत्रण से बाहर हैं।

सख्त कानून की दरकार

राज्य में सख्त कानून नहीं होने से निजी कॉलेज मनमाने तरीके से फीस वसूल रहे हैं और एमबीबीएस की पूरी पढ़ाई पर डेढ़ करोड़ रुपए तक का खर्च पहुंच गया है। कुछ राज्यों में निजी मेडिकल कॉलेजों की वार्षिक ट्यूशन फीस लगभग 8 से 10 लाख रुपए तक सीमित है।

फीस निर्धारण की ठोस व्यवस्था नहीं

कई राज्यों में फीस निर्धारण का अधिकार राज्य सरकार के पास है। इन राज्यों में कॉलेज राज्य सरकार की अनुमति के बिना फीस नहीं बढ़ा सकते। कुछ अन्य राज्यों ने भी अध्यादेश व नियमावली के जरिये निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना नियंत्रित की है। इन राज्यों में पूरे एमबीबीएस कोर्स का खर्च करीब 50 लाख रुपए के बीच सीमित है। राजस्थान में फीस निर्धारण को लेकर कोई ठोस नियंत्रण व्यवस्था नहीं है। यहां अधिकांश निजी कॉलेजों की सालाना फीस 18-20 लाख से 35 लाख रुपए तक है।

लाचार हैं निम्न व मध्यम वर्ग

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान में फीस नियंत्रण व्यवस्था मजबूत नहीं होने का नुकसान आर्थिक रूप से कमजोर छात्र-छात्राओं को उठाना पड़ रहा है। भविष्य में निजी कॉलेजों की बढ़ती फीस का सीधा असर प्रदेश के डॉक्टर बनने वाले युवाओं की संख्या और गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

एक ही कोर्स का खर्च अलग- अलग

देश के मेडिकल कॉलेजों को अनुमति देने व मानक तय करने का काम नेशनल मेडिकल कमीशन के पास है। कमीशन मापदंड पूरे होने पर ही कॉलेजों को संचालन की अनुमति देता है। फिर भी राज्यों में मेडिकल शिक्षा की फीस को लेकर अंतर दिख रहा है। कहीं राज्य सरकार नियंत्रण रखकर फीस को काबू में रखती है तो कहीं कॉलेजों को खुली छूट मिली है। नतीजा यह है कि एक ही कोर्स की पढ़ाई कहीं 45-50 लाख में हो रही तो कहीं इसका खर्च डेढ़ करोड़ तक पहुंच गया है।

अफसर ये बोले…

राज्य में फीस कमेटी है। जो 3 साल में एक बार आरयूएचएस से सम्बद्ध निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस तय करती है। निजी विश्वविद्यालय इस कमेटी के नियंत्रण में नहीं होते। वहां फीस स्वयं विवि के स्तर पर ही तय होती है। फीस नियंत्रण को अधिक मजबूत करने के लिए उच्च स्तर पर चर्चा करेंगे। -अंबरीश कुमार, चिकित्सा शिक्षा सचिव,