
Sachin Pilot with Mallikarjun Kharge - File PIC
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने अपने राष्ट्रीय संगठनात्मक ढाचें में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और बड़ा फेरबदल किया है। इसके तहत राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का नया मुख्य प्रभारी नियुक्त किया है। कांग्रेस आलाकमान ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट पर भरोसा जताते हुए उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी है। पंजाब में फरवरी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुए इस फेरबदल को बेहद अहम माना जा रहा है। कांग्रेस पार्टी पंजाब की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर करके वापस अपनी सरकार बनाने के लिए एक लंबे समय की रणनीति पर काम कर रही है, और इसी कड़ी में सचिन पायलट की एंट्री को संगठन में नई जान फूंकने वाला कदम माना जा रहा है।
राजस्थान की राजनीति के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक सचिन पायलट को पंजाब भेजने के पीछे पार्टी का एक बहुत ही स्पष्ट रणनीतिक प्लान छिपा हुआ है। पंजाब कांग्रेस इस समय अंदरूनी गुटबाजी और खींचतान से काफी हद तक जूझ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के अलग-अलग गुटों में लंबे समय से तनातनी देखने को मिल रही है। पूर्व प्रभारी भूपेश बघेल पर एक तरफा झुकाव रखने के आरोप लग रहे थे।
ऐसे में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने सचिन पायलट को एक पूरी तरह से प्रभावी 'संकटमोचक" के रूप में पंजाब भेजा है ताकि वे चुनाव से पहले सभी धड़ों को एक साथ एक मंच पर ला सकें।
इस पूरी नियुक्ति का सबसे रोचक और दिलचस्प पहलू यह है कि आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव में मुकाबला केवल दो पार्टियों का नहीं, बल्कि राजस्थान के दो सबसे बड़े राजनीतिक चेहरों का भी होगा। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी ने भी कुछ समय पहले ही राजस्थान के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को पंजाब भाजपा का प्रभारी नियुक्त किया था।
अब कांग्रेस की तरफ से सचिन पायलट के पंजाब प्रभारी बनने के बाद 2027 के पंजाब चुनाव की पूरी रणनीतिक कमान राजस्थान के दो बड़े नेताओं के हाथों में आ गई है। एक तरफ जहां सतीश पूनिया भाजपा के संगठन को मजबूत करने के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सचिन पायलट कांग्रेस के बिखरे हुए कुनबे को समेटने का काम करेंगे। राजस्थान के इन दो क्षत्रपों का पंजाब की धरती पर आमना-सामना होना पूरे देश के राजनीतिक पंडितों के लिए बेहद दिलचस्प चर्चा का विषय बन गया है।
सचिन पायलट को राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत और सफल 'ट्रबलशूटर' के रूप में देखा जाता है। उनके पिछले रिकॉर्ड पर नजर डालें तो वे जब-जब कठिन परिस्थितियों में संगठन की कमान संभालते हैं, तब-तब बेहतर नतीजे सामने आए हैं:
राजस्थान (2014 से 2020): 2013 के चुनाव में जब राजस्थान में कांग्रेस मात्र 21 सीटों पर सिमट गई थी, तब पायलट ने प्रदेश अध्यक्ष बनकर 5 सालों तक जमीनी स्तर पर कड़ा संघर्ष किया और 2018 में पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस लाए।
केरल विधानसभा चुनाव 2026: केरल चुनावों के दौरान उन्हें सीनियर ऑब्जर्वर बनाकर भेजा गया था, जहां उनकी सटीक रणनीति के दम पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन (UDF) ने ऐतिहासिक जीत हासिल की।
छत्तीसगढ़ प्रभार: दिसंबर 2023 की हार के बाद उन्हें छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया गया था, जहां उन्होंने कार्यकर्ताओं के मनोबल को वापस बढ़ाने का बड़ा काम किया था। अब उनकी जगह छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी सुखदेव भगत को सौंपी गई है।
पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं, जिनमें राजा वड़िंग और प्रताप सिंह बाजवा शामिल हैं, ने सचिन पायलट को पंजाब की कमान सौंपे जाने के फैसले का खुलकर स्वागत किया है। पंजाब के युवा कार्यकर्ताओं में पायलट की एक अलग ही लोकप्रियता देखने को मिलती है। हालांकि, उनके सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती चन्नी और वड़िंग के गुटों के बीच जमी बर्फ को पिघलाकर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की होगी।
आलाकमान को पूरी उम्मीद है कि राजस्थान में जमीनी लड़ाई लड़ने का पायलट का लंबा अनुभव पंजाब के इस पेचीदा राजनीतिक माहौल को सुलझाने में काफी मददगार साबित होगा। अब देखना यह होगा कि क्या सचिन पायलट केरल और राजस्थान की तर्ज पर पंजाब में भी कांग्रेस की वापसी का नया रास्ता तैयार कर पाते हैं या नहीं।
Updated on:
06 Sept 2026 10:14 am
Published on:
06 Sept 2026 07:50 am
