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जैसलमेर. शहरों में चुनाव खत्म होते ही आम मतदाता की भूमिका फिलहाल थम गई है, लेकिन राजनीतिक दलों का काम अब शुरू हुआ है। 9 और 11 सितंबर को हुए मतदान के बाद जैसलमेर के 44 और पोकरण के 25 वार्डों की ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम में हैं। फैसला 14 सितंबर को खुलेगा, लेकिन दोनों प्रमुख दलों के कार्यालयों और राजनीतिक खेमों में कैलकुलेटर पहले ही चलने लगे हैं। अब सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि किसके पास बोर्ड बनाने लायक संख्या आएगी? कौन बहुमत से कितने कदम दूर रहेगा? कौन से वार्ड सत्ता का अंतर तय करेंगे? और अगर आंकड़ा अधूरा रहा तो निर्दलीय व बागी पार्षद किस तरफ जाएंगे?
जैसलमेर में 44 वार्डों में मुकाबला हुआ है। यहां बोर्ड बनाने के लिए 23 पार्षदों का बहुमत जरूरी है। इसलिए राजनीतिक दलों का बूथवार गणित अब सीधे इसी आंकड़े के आसपास घूम रहा है। पोकरण के 25 वार्डों में भी यही तस्वीर अलग रूप में सामने आएगी। यहां अध्यक्ष पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। इसलिए परिणाम आने के साथ सिर्फ दलों की संख्या नहीं, बल्कि अध्यक्ष पद के लिए संभावित चेहरे और उनके पीछे खड़े पार्षदों की ताकत भी महत्वपूर्ण होगी।
23: जैसलमेर में बोर्ड के लिए जरूरी बहुमत का आंकड़ा।
44: जैसलमेर में तय होने वाली पार्षदों की सीटें।
25: पोकरण नगरपालिका में कुल वार्ड।
69: दोनों निकायों के कुल वार्डों का चुनावी फैसला।
14 सितंबर: मतगणना के साथ वार्डवार राजनीतिक तस्वीर साफ होगी।
निर्दलीय: बहुमत अधूरा रहने पर सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संख्या।
बागी: जीतने की स्थिति में पुराने दलों के लिए नई चुनौती।
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1. सीधा बहुमत—बोर्ड पर सीधा कब्जा
किसी दल को जैसलमेर में 23 या उससे ज्यादा सीटें मिलती हैं तो बोर्ड गठन का रास्ता सबसे साफ रहेगा। दल को बाहर से समर्थन जुटाने की जरूरत नहीं होगी।
2. बहुमत से थोड़ा पीछे—शुरू होगा संपर्क अभियान
यदि कोई दल 20-22 सीटों तक पहुंचता है तो बाकी संख्या के लिए निर्दलीय और बागियों की अहमियत अचानक बढ़ जाएगी। यहां एक-एक पार्षद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
3. बराबरी का मुकाबला—निर्दलीय बनेंगे किंगमेकर
दोनों बड़े दल करीब-करीब बराबर संख्या पर रुकते हैं तो निर्दलीय पार्षद बोर्ड की दिशा तय कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में परिणाम के बाद राजनीतिक बातचीत सबसे महत्वपूर्ण होगी।
4. बागियों की जीत—दल के भीतर नई चुनौती
जिन नेताओं या कार्यकर्ताओं ने टिकट न मिलने पर अलग राह चुनी, उनकी जीत सिर्फ विरोधी दल के लिए चुनौती नहीं होगी। परिणाम के बाद उन्हें अपने पाले में लाना दोनों प्रमुख दलों के लिए जरूरी हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार नगर निकाय चुनाव में विधानसभा या लोकसभा जैसी सीधी पार्टीवार तस्वीर हमेशा नहीं बनती। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, वार्ड के स्थानीय मुद्दे और सामाजिक समीकरण भी परिणाम प्रभावित करते हैं। स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर व्यक्तिगत रिश्ते और निर्दलीय पार्षदों का समर्थन बोर्ड गठन में निर्णायक हो सकता है।
14 सितंबर को स्ट्रॉन्ग रूम खुलेगा और राजनीतिक दावों की जगह आधिकारिक आंकड़े सामने होंगे। उस दिन यह सिर्फ पता नहीं चलेगा कि कौन जीता और कौन हारा। असली कहानी यह होगी कि किस दल के पास कितनी ताकत आई, कौन बहुमत से कितना दूर रहा और सत्ता की चाबी किसके हाथ पहुंची।
जैसलमेर में 23 का आंकड़ा और पोकरण में अध्यक्ष पद का समीकरण—दोनों के बीच 69 वार्डों का जनादेश अब सत्ता के नए अध्याय की भूमिका लिखने वाला है।
Updated on:
12 Sept 2026 08:21 pm
Published on:
12 Sept 2026 08:21 pm
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