
देश की पश्चिमी सीमा के अंतिम छोर पर बसा जैसलमेर शहर और करीब 464 किलोमीटर लम्बी अंतरराष्ट्रीय सीमा तक आजादी के उत्सव में देश की आन-बान और शान के प्रतीक तिरंगे के रंगों में सराबोर नजर आ रहे हैं। स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या तक ही हर कहीं तिरंगे की धूम साफ तौर पर देखी जा सकती है। हर घर तिरंगा अभियान का यह असर है कि स्वतंत्रता दिवस से पहले ही चारों तरफ आजादी के जश्न का मंच पूरी तरह से सजा दिखता है। लोगों में भी भरपूर उत्साह है। चारों तरफ तिरंगे झंडों की मांग हो रही है ताकि उन्हें निजी प्रतिष्ठानों व घरों पर लगाया जा सके। स्वर्णनगरी में तिरंगे के प्रति आकर्षण पिछले कई वर्षों के दौरान खासा बढ़ चुका है। पूर्व में केवल खादी से बने झंडों की मांग होती थी क्योंकि तब तक केवल खादी का बना झंडी ही लहराया जा सकता था। इस पाबंदी को अब केंद्र सरकार ने ध्वज संहिता में बदलाव कर हटा दिया है।
जिले में पिछले दिनों के दौरान प्रशासन व सीमा सुरक्षा बल की तरफ से कई तिरंगा रैलियों व इससे संबंधित कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। गांवों में विद्यालय स्तर पर और पंचायतों की ओर से तिरंगा रैलियां निकाले जाने से दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों के बाशिंदे आजादी के उत्सव में भागीदार हो गए हैं। वहीं भाजपा ने इस बार भी हर घर तिरंगा के तहत शहर से गांवों तक कार्यक्रम किए। सीमा सुरक्षा बल के जवानों की ओर से लगातार वाहन रैलियों के माध्यम से माहौल बनाया जा चुका है। कई सरकारी व निजी विद्यालयों में झंडा वितरण और आजादी के उत्सव से जुड़े कार्यक्रम करवाए गए हैं।
पूर्व में राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर तिरंगा फराहने से जुड़ी कई पाबंदियों को भारत सरकार की ओर से हटाया जा चुका है। ध्वज संहिता में संशोधन के बाद अब चहुंओर तिरंगा छाया नजर आने लगा है। अब दिन के साथ रात में भी राष्ट्रीय ध्वज को फहराया जा सकता है। सरकार ने मशीन से बने और पॉलिएस्टर के झंडे के उपयोग की इजाजत दी जा चुकी है। संशोधन के बाद भारत ध्वज संहिता में निर्देशित किया गया है कि राष्ट्रीय ध्वज हाथ से काते, हाथ से बुने हुए या मशीन से बने कपास, पॉलिएस्टर, ऊन, रेशम, खादी से बनाया जा सकता है। रात में भी ध्वज फहराने की अनुमति है लेकिन इसके लिए झंडा किसी खुले स्थान पर किसी के घर पर फहराया जाना चाहिए।
जानकारी के अनुसार 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता (अब कोलकाता) के लोअर सर्कल रोड के पास पारसी बागान चौराहे पर पहली बार तीन रंग का झंडा फहराया गया था। इस झंडे में लाल, पीले और हरे रंग की तीन आड़ी पट्टिया थीं। इसके बाद 1921 में स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वैंकया ने झंडे की एक मूल डिजाइन के प्रस्ताव को रखने के लिए महात्मा गांधी से मुलाकात की। उस दौरान इसमें दो लाल और एक हरे रंग की पट्टी रखी गई थी। आगे चलकर कई बदलावों से गुजरने के बाद 1931 को कराची में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर स्वीकृति दी गई। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा की बैठक हुई जिसमें भारतीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में मान्यता दी गई।
Published on:
14 Aug 2025 10:39 pm
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