
सचिन बैरागी
प्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में शुमार आदिवासी बहुलता वाले झाबुआ को आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सुख सुविधाओं के दृष्टिकोण से देखा तो पाया कि आज भी इस जिले के बाशिंदे पेट की खातिर पलायन के लिए विवश हैं। जिले में उनके लिए रोजगार नहीं है। इस कारण पलायन उनकी नियति है, जिसमें गुजरात उनका बड़ा आसरा बना हुआ है। पलायन के दौरान गांव के गांव खाली होने के नजारे आम हैं। झाबुआ, थांदला और पेटलावद जिले के तीनों विधानसभा क्षेत्रों का दौरा खत्म कर निष्कर्ष पर सोचने लगा, तो महसूस हुआ कि बेरोजगारी और पेयजल संकट कैसे किसी आम आदमी की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित कर देते हैं।
पानी के लिए रतजगा
सफर की शुरुआत की पेटलावद विधानसभा क्षेत्र के गांव खरडू बड़ी से। शंकर डामोर की चाय की दुकान पर बैठे युवक चेनसिंह डामोर ने बताया जल जीवन मिशन के तहत गांव में टंकी बन गई है। लेकिन पानी नहीं आया। 50 वर्षीय नारायणसिंह बोले, गांव के दो हैंडपंप ही चालू हैं। यहां रात से ही पानी भरने वालों की कतार लग जाती है। 62 वर्षीय किसान पीडू डामोर का कहना था, 'धार जिले के धरमपुरी में डैम बनाया गया है, लेकिन इस बार पानी ही नहीं छोड़ा गया। गेंहू की फसल को आखिरी पानी नहीं दे पाए। इस कारण फसल खराब हो गई।Ó हमने उनसे पूछा कि आसपास कहीं खेती की स्थिति अच्छी है, तो उन्होंने ग्राम आम्बा का नाम गिनाया। हम खरडू बड़ी से इसी सड़क से होते हुए आम्बा जा पहुंचे। वास्तव में गांव सिंचाई सुविधा से समृद्ध मिला। बाबेरिया परिवार के सदस्य कमलसिंह और नरवेसिंह ने इसकी तस्दीक भी की, लेकिन यह शिकायत भी की कि खाद पर्याप्त नहीं मिलता। इस कारण 266 रुपए का खाद बाजार से 500 रुपए में लेना पड़ता है।
गांव में काम नहीं, बाहर मजदूरी भी मिलती है अधिक
हमारा अगला पड़ाव था झाबुआ विधानसभा क्षेत्र। इसमें सबसे पहले पहुंचे ग्राम पीथनपुर। अपने खेत में बने घर के बाहर बुजुर्ग चेनसिंह भूरा बारिया डागले (मचान) के नीचे खटिया पर सुस्ता रहे थे। चेनसिंह ने बताया कि कुछ दिन पहले उसके घर के बाहर से ही पानी की पाइप लाइन डाली गई। इसके बावजूद वे हैंडपंप से पानी भरने को मजबूर हैं। इस बीच उसका बेटा मडिया और बेटी-बहू भी घर से बाहर आ गए। मडिया ने पूछने पर बताया कि वह मजदूरी करने गुजरात जाता है। इसकी वजह पूछी तो वह कहने लगा गांव में काम नहीं चल रहे, तो क्या करें। गुजरात जाते हैं। वहां मजदूरी भी ज्यादा मिलती है। हमें उनकी पीड़ा समझ आ रही थी। फिर हम गांव सेमलिया बड़ा पहुंचे। गांव के जम्मू बिजिया पारगी और नानसिंह सिंगाडिय़ा ने बताया इंसानों के लिए तो ठीक मवेशियों को पिलाने तक का पानी नहीं है। हर दो दिन में 600 रुपए में टैंकर मंगवाना पड़ रहा है।
रेलवे लाइन होने के बाद भी नहीं पनपा औद्योगिक क्षेत्र
जिले की तीसरी विधानसभा सीट थांदला के रहवासियों की पीड़ा क्षेत्र में औद्योगिक विकास ठप हो जाने को लेकर थी। कभी अच्छा औद्योगिक क्षेत्र कहलाने वाले मेघनगर में साईं चौराहे पर हमें मिले युवा राजेद्र सिंह सोनगरा। उनका कहना था जिस तरह से धार में पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र का विकास हुआ है, वैसा यहां कुछ भी नहीं हो पाया। कई फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। रेलवे स्टेशन होने के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र और यहां के लोगों को उतना लाभ नहीं मिल पाया है।
डीएपी प्लांट से उम्मीदें
मेघनगर के हरिराम गिरधानी हाल ही में डीएपी का बड़ा प्लांट डाले जाने से कुछ उम्मीद से भरे नजर आए। उनका कहना था इस प्लांट के सफल होने के बाद बड़े समूह यहां आ सकते हैं। इसी विधानसभा क्षेत्र के ग्राम नवागांव खालसा की मरिया गणावा भी सरकारी योजनाओं से खुश नजर आई। उनका कहना था कि सरकार महिला स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने के लिए अच्छा काम कर रही है।
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Updated on:
25 May 2023 12:01 pm
Published on:
25 May 2023 11:53 am

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