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Rajasthan : राजस्थान के मशहूर कवि दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन, अंतिम संस्कार हुआ, अशोक गहलोत ने जताया दुख

Rajasthan : राजस्थान के प्रसिद्ध कवि-गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ के निधन पर अशोक गहलोत ने दुख जताते हुए कहा कि प्रदेश के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जगत को गहरा आघात पहुंचा।
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Durgadan Singh Gaur death : अशोक गहलोत और मशहूर कवि दुर्गादान सिंह गौड़। फोटो पत्रिका

Rajasthan : राजस्थानी भाषा के मशहूर गीतकार व कवि गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ का रविवार शाम निधन हो गया था। उनके निधन की सूचना के बाद साहित्य जगत में शोक की लहर छा गई। इस मौके पर कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत सहित कई जाने माने लोग ने दुख प्रकट किया। अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया अकाउंट X पर लिखा कि राजस्थान के प्रसिद्ध कवि एवं गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ (80 वर्ष) के निधन का समाचार बेहद दुखद है। उनके निधन से प्रदेश के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जगत को गहरा आघात पहुंचा है। हाड़ौती के कालिदास के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने वाले दुर्गादान सिंह गौड़ ने अपनी रचनाओं से राजस्थानी साहित्य को समृद्ध किया। मेरी गहरी संवेदनाएं उनके परिवार एवं उनके प्रशंसकों के साथ हैं। ईश्वर से उनकी आत्मा को शांति देने की प्रार्थना करता हूं। ॐ शांति। मशहूर कवि कुमार विश्वास ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए 'हाड़ौती की वीणा' और 'लोकभाषा के कालिदास' बताया है।

‘हाड़ौती के कालिदास’… दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन

राजस्थानी भाषा के गीत ऋषि और हाड़ौती के कालिदास के नाम से लोकप्रिय गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ ने रविवार शाम करीब साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनका इलाज कोटा के निजी अस्पताल में चल रहा था। उनके निधन की सूचना के बाद साहित्य जगत में शोक की लहर छा गई।

गांव जोलपा में हुआ अंतिम संस्कार

दुर्गादान सिंह गौड़ झालावाड़ जिले की खानपुर तहसील के जोलपा गांव के मूल निवासी थे। उनका अंतिम संस्कार उनके गांव जोलपा में आज दोपहर करीब एक बजे के आस पास हुआ। इस दौरान बहुत से लोग उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। दुर्गादान सिंह गौड़ अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। परिवार में चार बेटे और दो बेटियां हैं।

साहित्य के क्षेत्र में दुर्गादान सिंह गौड़ का अमूल्य योगदान

साहित्य के क्षेत्र में दुर्गादान सिंह गौड़ ने अमूल्य योगदान दिया। उनकी ‘पाणी में चांद घुले’ समेत दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दो पुस्तकें ‘राधे-राधे’ और ‘रेखाचित्र’ जल्द प्रकाशित होने वाली थीं।

साठ के दशक में अकाल पर उनका गीत ‘हिवड़ो जले, म्हारो जियरो बले, धरती थारा जाया लाल भूखा क्यों मरै’ गीत काफी प्रसिद्ध हुआ। साठ-सत्तर के दशक में ‘मद्गाल्यो मोरयो’ गाते तो जवान पीढ़ी के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी भी चुप होकर सुनती रह जाती। ‘तू कतनी खूब चले छै, जाणै थाली में मूंग रळै छै।’ अब ‘न्हाती धोती नतरती दैखी’ जैसे गीतों की मिठास कर्णपटल पर हमेशा गूंजती रहेगी। उनका जाना हाड़ौती अंचल ही नहीं, बल्कि राजस्थान के शृंगार गीतों के एक युग का जाना है। उन्हें साहित्य जगत हमेशा याद करता रहेगा।