
जयपुर/जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट मंगलवार को अपनी स्थापना के 75 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। अपने 74 साल के सफर में हाईकोर्ट ने न केवल सती प्रथा, भ्रूण हत्या और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न जैसी बुराइयों पर प्रहार किया, बल्कि पंचायती राज स्थापना और दो से अधिक संतान पर पंचायती राज चुनाव लड़ने पर रोक जैसे कई प्रगतिशील विषयों को संरक्षण दिया। राजस्थान हाईकोर्ट में रहे तीन न्यायाधीश अब तक देश के प्रधान न्यायाधीश के पद तक पहुंचे हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अब तक ऐसे कई फैसले दिए हैं, जिन्होंने प्रदेश ही देश के इतिहास को नया रूप दिया। संविधान लागू होने से पहले प्रदेश में रियासतों के हाईकोर्ट हुआ करते थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि उस समय भारतीय संविधान भले नहीं था, लेकिन बूंदी व जयपुर रियासत के हाईकोर्ट ने अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ आदेश दिया और पीड़ितों को मुआवजा भी दिलाया। इनमें से प्रख्यात वकील चिरंजी लाल अग्रवाल ने तो मुआवजे में मिले 60 हजार रुपए से ट्रस्ट बनाया और उसका पैसा आज भी शिक्षा पर खर्च हो रहा है। उनके बेटे एस सी अग्रवाल सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश पद तक पहुंचे और उन्होंने भारत यात्रा पर आए अरब राजपरिवार के व्यक्ति को गोडावन का शिकार करने से रोक दिया। राजस्थान हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश रहने के बाद सीजेआई रहे जे एस वर्मा की कमेटी ने दिल्लीे के निर्भया प्रकरण में और सीजेआई रहे आर एम लोढ़ा ने विवादों में रही बीसीसीआई की चुनाव व्यवस्था को बदलने के लिए ऐतिहासिक रिपोर्ट दी। इन रिपोट का देशभर में असर हुआ है।
वर्चुअल कोर्ट की पहल: कोविड काल में राजस्थान हाईकोर्ट ने देश के अन्य न्यायालयों की तरह वर्चुअल सुनवाई की। राजस्थान हाईकोर्ट की पहल को देश में कई जगह प्रभावी बताया गया।
भवन बना मिसाल: राजस्थान हाईकोर्ट न केवल अपने काम के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि जोधपुर स्थित हाईकोर्ट के नए भवन का अन्य जगह भी उदाहरण दिया जाता है।
ऐसे हुई हाईकोर्ट की स्थापना: 30 मार्च, 1949 को राजस्थान की स्थापना हुई और 29 अगस्त, 1949 को राजप्रमुख और जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह ने जोधपुर में राजस्थान हाईकोर्ट की आधारशिला रखी।प्रारंभ में हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जोधपुर और पीठ कोटा, जयपुर और उदयपुर में थी। बाद में रियासतों में चल रहे हाईकोर्ट समाप्त कर दिए गए। इसके बाद दो प्रतिष्ठित अधिवक्ता जोधपुर से इंद्र नाथ मोदी और जयपुर से दौलतमल भंडारी को न्यायाधीश बनाया गया। भंडारी पहले जयपुर से सांसद भी रहे। बीच में हाईकोर्ट की पीठ जयपुर में नहीं रही, 1956 में जयपुर में पुन: अस्थाई पीठ की स्थापना हुई। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के सी वांचू जोधपुर-जयपुर दोनों जगह सुनवाई के लिए अधिकृत थे। वर्ष 1958 में जयपुर पीठ समाप्त कर गई और 31 मार्च, 1977 को जयपुर में फिर पीठ स्थापित की गई।
यह बोले पूर्व न्यायाधीश
राजस्थान में रियासतकाल से ही मूल अधिकारों को महत्ता दी जाती रही और उन्हें हाईकोर्ट ने संरक्षण दिया। जागीरदारी प्रथा को समाप्त करने में भी राजस्थान हाईकोर्ट की भूमिका रही।
- वीएस दवे, पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने सती प्रथा के खिलाफ आदेश देकर उसे बंद कराया, भ्रूण हत्या को रोकने की पहल की।विशाखा मामले में भी पहले हाईकोर्ट ने ही कार्यस्थल पर महिलाओं को संरक्षण दिलाया, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत गाइडलाइन दी।
- पानाचंद जैन, पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान हाईकोर्ट
नागौर में पंचायती राज की स्थापना हुई, तब उसे भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और कोर्ट ने पंचायती राज स्थापना के पक्ष में फैसला दिया। जयपुर में बेंच बनाने के निर्णय को भी सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया।
- ए के माथुर, पूर्व न्यायाधीश , सुप्रीम कोर्ट
Published on:
29 Aug 2023 10:38 am
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