
फोटो: पत्रिका
जोधपुर। नगर निगम चुनाव से पहले वार्ड आरक्षण की लॉटरी ने शहर की सियासत की बिसात बदल दी है। नए परिसीमन के बाद अब आरक्षण ने कई पुराने दिग्गजों की चुनावी जमीन खिसका दी है, जबकि कुछ नेताओं के लिए मौजूदा वार्ड ही आगे की सियासी पारी का रास्ता खोल रहे हैं। सबसे बड़ा असर उन वार्डों में पड़ा है, जो पिछले चुनाव में पुरुष दावेदारों के लिए खुले थे और अब महिला या ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हो गए हैं।
ऐसे में टिकट की दौड़ में नए चेहरों और महिला दावेदारों की एंट्री तय मानी जा रही है। वार्ड 22 में पूर्व महापौर घनश्याम ओझा, वार्ड 23 में पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष जगतनारायण जोशी, वार्ड 25 में भाजपा नेत्री इन्द्रा राजपुरोहित और वार्ड 40 में पूर्व उप महापौर देवेन्द्र सालेचा तथा कांग्रेस के नरेश जोशी के वार्ड सामान्य रहे हैं। ऐसे में इन नेताओं के लिए अपने वार्ड से चुनाव लड़ने का रास्ता फिलहाल खुला है।
पूर्व मेयर दक्षिण वनिता सेठ का मौजूदा वार्ड नंबर 41 ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हो गया है। ऐसे में वे इस बार अपने मौजूदा वार्ड से चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। हालांकि पिछले निकाय चुनाव में उन्होंने चौपासनी हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र के वार्ड नंबर 16 से चुनाव लड़ा था। इस बार वार्ड नंबर 16 अनारक्षित ओपन कैटेगरी में है। ऐसे में अब चर्चा शुरू हो गई है कि क्या वनिता सेठ एक बार फिर अपने पुराने चुनावी क्षेत्र का रुख कर सकती हैं।
कांग्रेस की पूर्व मेयर उत्तर कुंती देवड़ा के लिए लॉटरी राहत लेकर आई है। उनका वार्ड नंबर 93 अनारक्षित ओपन कैटेगरी में रखा गया है। वार्ड सुरक्षित होने के बावजूद टिकट का अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व और संगठन की रणनीति पर निर्भर करेगा। जोधपुर के भीतरी शहर के जालप मोहल्ला क्षेत्र से लगातार चार बार पार्षद रहे भाजपा के सुरेश जोशी का वार्ड इस बार अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित हो गया है। इस बार भी वे संभावित दावेदारों में माने जा रहे थे। अब आरक्षण बदलने के बाद उनके सामने नया वार्ड तलाशने की चुनौती खड़ी हो गई है।
कांग्रेस के पीसीसी मेंबर और पूर्व पार्षद सुनील व्यास का वार्ड नंबर 60 ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुआ है। व्यास चार बार पार्षद रह चुके हैं। अब उनके भी दूसरे वार्ड से चुनाव लडऩे की संभावना जताई जा रही है। दोनों प्रमुख दलों के सामने ऐसे नेताओं के लिए सुरक्षित वार्ड तलाशना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा प्रदीप गांग, मनीष लोढ़ा , कुश गहलोत, शाहबुद्दीन खान, मयंक देवड़ा के वार्ड भी महिला आरक्षित हो गए है। इसके अलावा कांग्रेस नेत्री शैलजा परिहार का वार्ड भी एससी हो गया है। इससे इन नेताओं को भी राजनीतिक जमीन तलाशनी होगी।
भाजपा जिलाध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल का वार्ड 13 अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित हुआ है। हालांकि पालीवाल पहले ही चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर चुके हैं। उनका फोकस निगम में भाजपा का बोर्ड बनाने पर है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष ओमकार वर्मा का वार्ड 42 अनारक्षित रहा है, लेकिन वे भी चुनाव नहीं लड़ने की बात कह चुके हैं। तीन बार पार्षद और एक बार मनोनीत पार्षद रहे वर्मा अब संगठन की भूमिका में रहकर चुनावी रणनीति बनाने की तैयारी में हैं।
नगर निगम के 100 वार्डों में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इनमें सामान्य महिला के साथ एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग की महिला सीटें भी शामिल हैं। ऐसे में इस बार नगर निगम की राजनीति में महिला उम्मीदवारों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगी। खासकर उन वार्डों में जहां पिछली बार सामान्य सीट थी और अब महिला आरक्षित हो गई है, वहां पुराने पुरुष दावेदारों की दावेदारी स्वत: समाप्त हो गई है। अब भाजपा और कांग्रेस को सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं, सामाजिक क्षेत्र में पहचान रखने वाली महिलाओं और राजनीतिक परिवारों से जुड़े चेहरों में से चुनावी तौर पर मजबूत उम्मीदवार तलाशने होंगे।
वार्ड लॉटरी के बाद पहला सियासी पड़ाव पूरा हो गया है। अब असली मुकाबला टिकट वितरण को लेकर होगा। आरक्षण से प्रभावित दिग्गजों के सामने तीन रास्ते हैं नया वार्ड तलाशना, परिवार के सदस्य को मैदान में उतारना या संगठन की जिम्मेदारी संभालना। दूसरी तरफ पार्टियों के पास वर्षों से वार्ड स्तर पर सक्रिय नए चेहरों को आगे बढ़ाने का मौका है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में दोनों दलों में टिकट के दावेदारों की दौड़, बगावत और वार्ड बदलने की राजनीति चुनाव का सबसे दिलचस्प हिस्सा बन सकती है।
Updated on:
18 Aug 2026 02:26 pm
Published on:
18 Aug 2026 02:26 pm
