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Republic Day: संविधान निर्माण के यज्ञ में जोधपुर की आहुति, जाने कैसे…

पूर्व मुख्यमंत्री जय नारायण व्यास ने संविधान निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी। संविधान सभा की अंतिम बैठक में संविधान पर हस्ताक्षर करने वालों में जोधपुर के जय नारायण व्यास भी एक थे।
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जयकुमार भाटी/जोधपुर। आज देश 75वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है, लेकिन भारतीय संविधान निर्माण के यज्ञ में जोधपुर की आहुति भी रही हैं। संविधान सभा की अंतिम बैठक में संविधान पर हस्ताक्षर करने वालों में जोधपुर के जय नारायण व्यास भी एक थे। भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया 9 दिसंबर 1946 को शुरू हुई और 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में 284 सदस्यों ने संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए। जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री जय नारायण व्यास भी थे। ऐसे में भारतीय संविधान को बनने में 2 साल 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। जिससे भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया और उस दिन से गणतंत्र दिवस मनाया जाने लगा हैं।


व्यास ने निभाई सक्रिय भूमिका
संविधान सभा में जोधपुर से जय नारायण व्यास के अलावा वी एस वेंकटाचारी भी थे, लेकिन व्यास ने प्रथम दो सत्रों के बाद लगातार सभी सत्रों में भाग लेते हुए संविधान निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई थी। व्यास सभा में पहली बार तीसरे सत्र के प्रारंभ से शामिल हुए। अपनी पहली बैठक में ही उन्होंने सभा को संबोधित किया था। उन्होंने अपने संबोधन में देशी रियासतों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कैबिनेट मिशन की आलोचना भी की थी। वे मानते थे कि प्रजामण्डल से जुड़े लोग ही देशी रियासतों के सच्चे प्रतिनिधि हैं। 16 जुलाई 1947 को सभा में गठित तीन सदस्य गृह समिति के व्यास सदस्य भी बने। 22 जुलाई 1947 को पंडित नेहरू की ओर से सभा में रखे गये ध्वज प्रस्ताव पर भी उनका सुंदर उद्बोधन हुआ था। उन्होंने कहा कि इस तिरंगे के नीचे प्रांतों के लोगों के साथ देशी राज्यों की जनता ने भी लड़ाई लड़ी है।


लोकतंत्र की स्थापना के पक्ष में थे व्यास
संविधान सभा में उनके अधिकांश उद्बोधन देशी रियासतों में तुरंत लोकतंत्र की स्थापना से संबंधित रहे थे। उन्होंने मौलिक अधिकारों पर की गई चर्चा में भी भाग लिया था। उन्होंने राज्य की स्वायत्तता, रियासतों के पूर्व शासकों के अधिकारों और राज्य की सीमाओं के निर्धारण पर बहस में हस्तक्षेप किया। सभा में उनका अंतिम उद्बोधन 22 नवम्बर 1949 को हुआ। व्यास स्वतंत्र राजस्थान के वर्ष 1951 और 1954 के बीच दो बार मुख्यमंत्री भी रहे।

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