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बुआ की खामोशी बबुआ के लिए बनी टॉनिक, हाथी को उठानी पड़ सकती है भारी कीमत

अखिलेश की इस चाल से बसपा के अंदर खलबली मची हुई है...
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कानपुर

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Vinod Nigam

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Updated: 2 Jul 2018, 9:33 AM IST

Mayawati and Akhilesh Yadav political strategy for Gathbandhan

बुआ की खामोशी बबुआ के लिए बनी टॉनिक, हाथी को उठानी पड़ सकती है भारी कीमत

कानपुर. यूपी के गोरखुपुर-फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के दौरान बसपा प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों का समर्थन कर साइकिल दौड़ा दी। इसी के बाद अखिलेश यादव ने मायावती की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा आगामी लोकसभा चुनाव में गठबंधन करने का आमंत्रण दे दिया। मायावती ने भी खोई जमीन वापस पाने के लिए गेस्टहाउस कांड को भुला बबुआ को गले लगा गठबंधन का ऐलान कर दिया। लेकिन कैराना लोकसभा उपचुनाव के बाद बसपा सुपीमो ने यूपी में 40 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर अखिलेश को हिला दिया। दोनों तरफ से बयान आने बंद हो गए और सपा-बसपा कार्यकर्ताओं के बीच दुरियां बन गई। पर सियासी अखाड़े के माहिर खिलाड़ी मुलायम के बेटे टीपू ने मैनपुरी स्थित एक जनसभा में कहा कि यदि हमें संप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए सीटें छोड़नी पड़े तो हम वो भी करने को तैयार हैं। समाजवादी लोग त्यागी हैं और मोदी सरकार को रोकने के लिए हम कार्य करने को तैयार हैं। बावजूद बसपा की तरफ से गठबंधन को लेकर कोई संकेत नहीं मिला और यही चाल अखिलेश के लिए टॉनिक बन गई। सपा नेताओं ने अखिलेश के जन्मदिन के अवसर पर कहा कि गठबंधन शर्तो पर नहीं होता, बल्कि विश्वास पर किया जाता है। समाजवादी पार्टी यूपी की 80 में से 80 सीटों पर तैयारी कर रही है। कार्यकर्ताओं की फौज बूथों तक पहुंच चुकी है।

इसलिए अखिलेश बता रहे त्यागी पुरूष

लोकसभा चुनाव का रण लगभग सज चुका है और अगले साल इसका शंखदान हो जाएगा। इसी के चलते सभी राजनीति दल चुनावी तैयारी में जुटे हैं। जहां समाजवादी पार्टी विधानसभा वार बूथों में युवाओं को नियुक्त कर रही हैं तो वहीं मायावती भी संगठन में फेरबदल कर ब्राम्हण, दलित और मुस्लिम गठजोड़ के चुनाव फतह करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। पिछले 25 से 30 दिन के दौरान अखिलेश यादव व सपा नेताओं को छोड़कर गठबंधन पर किसी अन्य दल की तरफ से बयान नहीं आया। विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन दोनों दलों के नेता अब दूरियां बनाए हुए हैं। जबकि गोरखपुर-फूलपुर चुनाव के बाद मायावती ने गठबंधन का ऐलान कर भाजपा सहित अन्य दलों को चकित कर दिया, वो कैराना चुनाव के बाद चुप्पी साधे हुए हैं। मायावती की इसी खामोशी का फाएदा अब अखिलेश उठा रहे हैं।

मैनपुरी से चलाया था सियासी बाण

मायावती के खामोशी समाजवादी पार्टी के नेताओं के गले नहीं उतर रही थी। उन्हें आशंका है कि ऐन चुनाव के वक्त बसपा प्रमुख टिकट बंटवारे को लेकर सपा का साथ छोड़ गठबंधन तोड़ने का ठीकरा अखिलेश पर डाल कर दूसरे दल के समझौता कर सकती हैं। एक सपा नेता ने बताया कि कुछ दिन पहले अखिलेश यादव व राष्ट्रीय महासविच प्रोफेसर रामगोपाल यादव, प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम सहित कई अन्य नेताओं ने एक बैठक की। बैठक के बाद अखिलेश लखनऊ से सीधे सैफई पहुंचे और मैनपुरी स्थित एक जनसभा को संबोधित कर अपना सियासी बाण चला दिया। डीएवी कॉलेज के प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं कि अखिलेश भलीभांति जानते थे कि बसपा प्रमुख गठबंधन टूटने का पूरा ठीकरा सपा पर फोड़ सकती हैं। इसी के कारण उन्होंने मोदी सरकार को रोकने के लिए अपने को त्यागी बता जनता के पास अपना सीधा संदेश भेज दिया।

नफा-नुकसान का चल रहा आकलन

अखिलेश की इस चाल से बसपा के अंदर खलबली मची हुई है। खुद मायावती गठबंधन को लेकर कई बैठकें अपनी पार्टी के नेताओं के साथ कर चुकी हैं और फाएदे व नुकसान का आकलन भी कैडरों के जरिए करवा रही हैं। बसपा में अभी भी दो गुट हैं, जिसमें एक सपा के साथ गठबंधन के पक्ष में है तो दूसरा एकला चलो के अलावा कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने के लिए पार्टी प्रमुख पर दबाव बना रहा है। बसपा के एक पूर्व विधायक ने बताया कि सपा के साथ गठबंधन होने पर पार्टी को 30 से 32 सीटें मिलेंगी। इससे चुनाव की तैयारी कर रहे उम्मीदवार नाराज होकर भाजपा के पक्ष में जा सकते हैं। साथ ही सपा-बसपा के गठबंधन से वोटों का धुव्रीकरण होने की प्रबल संभावना है और इसका फाएदा सीधे भाजपा को होगा। जबकि कांग्रेस के साथ चुनाव में उतरने से सीटों के अलावा सवर्ण समाज का वोट भी पार्टी को मिलेगा।

गठबंधन टूटा तो सपा को फाएदा

जानकारों का मानना है कि अगर मायावती सीटों के बंटवारे पर अड़ी रहीं तो खुद अखिलेश अलग हो जाएंगे और इसका ठीकरा बसपा प्रमुख के सिर पर फोड़ेंगे। प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं कि मैनपुरी से दिया गया अखिलेश का भाषण मायावती के लिए परेसानी का सबब बन सकता है। मुस्लिम वोटर्स पहले से सपा के पास था, लेकिन लोकसभा और विधानसभा में बंट गया। अखिलेश के त्यागी पुरूष के बयान के बाद मुस्लिम वोटर्स बसपा के बजाए सीधे साइकिल के पक्ष में आ सकता है। साथ ही अखिलेश यादव चुनाव के वक्त मायावती पर निशाना भी साध सकते हैं। क्योंकि मायावती और भाजपा ने मिलकर यूपी में सरकार बनाई। इसी के चलते अब सपा के कद्दावर नेता भी मान रहे हैं कि गठबंधन पर शर्त के बजाए समझौते के तहत सीटों का बंटवारा होगा।