
कानपुर. राजपूत रानी पद्मावती पर बनी संजय लीला भंसारी की फिल्म 'पद्मावती' रिलीज से पहले विरोध का सामना कर रही है। देशभर में राजपूत समाज के साथ ही राजनीतिक दल भी इसके खिलाफ आवाज बुलंद किए हुए हैं। पद्मावती ने अलाउद्दीन खिलजी से खुद को बचाने के लिए किले में रह रही तमाम महिलाओं के साथ जौहर (सती) किया था। उनके बलिदान को राजपूत आज भी नमन करते हैं। ऐसी ही कुर्बानी बिठूर के क्रांतिकारी व मराठा सपूत नानाराव पेशवा की बेटी मैनावती ने भी दी थी। मैना ने अपने पराक्रम के बल पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे। मैना और झांसी की लक्ष्मीबाई का बचपन कानपुर स्थित बिठूर में गुजरा। दोनों ने यहीं पर तांत्या टोपे से शिक्षा-दीक्षा ली थी। 1857 का विद्रोह का आगाज नानाराव पेशवा ने किया और उनके साथ कदम से कदम मिलाकर मैना भी लड़ीं। अंग्रेजों ने धोखे से हमला कर वीरांगना को पकड़ लिया और उनके साथ डेढ़ सौ से ज्यादा महिलाओं को जिंदा जलाकर मौत के घाट उतार दिया।
कौन थीं वीरांगना मैनावती
मराठा क्रांतिकारी नानराव पेशवा ने बिठूर से 1857 में पहली बार बैरकपुर स्थित अंग्रेज भारत छोड़ो का नारा लगाया गया था। नानाराव पेशवा की बेटी मैनावती भी अपने पिता के संरक्षण में अंग्रेज सरकार के खिलाफ लड़ाई में कूदी थीं। मस्कर घाट से नानाराव नाव से इलाहाबाद जा रहे थे, इसी दौरान अंग्रेज सेना ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। तब मैना ने अपनी महिला बिग्रेड के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया। इस जंग में सैकड़ों की संख्या में संख्या में अंग्रेज फौजी मारे गए थे। इसी के बाद नानाराव ने मैना को कानपुर की कमान सौंप दी। इतिहासकार पंकज कपूर ने बताया कि नाना ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और मैना को घुड़सवारी और तलवारबाजी का हुनर सिखाने के लिए तांत्या टोपे को लगाया। उन्होंने दोनों वीरांगनाओं को युद्ध की कला से दक्ष किया था।
जागेरूवर घाट पर लड़ा दूसरा युद्ध
अंग्रेज फौजियों की मौत से अंग्रेज सरकार हिल गई और बिठूर पर पूरी एक पलटन ने हमला कर दिया। नानाराव अपनी बेटी और साथियों को लेकर महल से भागने में कामयाब रहे। अंग्रेजी फौज ने उनका पीछा करते हुए जागेश्वर घाट आ पहुंचे। मैना और उनके साथ 200 महिला क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए और यहां भी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। इतिहासकार कपूर कहते हैं कि अंग्रेज फौज ने रात को नानाराव पेशवा की सेना पर हमला किया था। जहां पहले से मैना अपनी महिला सेना के साथ मौजूद थीं। मैना ने अकेले 500 अंग्रेज सेना के सैनिकों के सिर धड़ से अलग किए थे। बताते हैं, मैना के पास मल्लाह महिलाओं की पूरी टुकड़ी थी, जो छिपकर अंग्रेजों पर हमले को अंजाम देती थी।
पांच हजार सैनिकों ने किया हमला
कानपुर कैंट में इलाहाबाद, बनारस से अंग्रेजी फौज की कई टुकड़ियां बुलाई गई और बिठूर पर चढ़ाई के लिए नाव पर रवाना कर दिया गया। अंग्रेज फौज ने नानाराव बैरकपुर गुफा में अपनी बेटी और सेना के साथ छिपे हुए थे। बिठूर पर बनी मीनार से मुखबिर ने घंटा बजाकर नानाराव को अंग्रेजी फौज के आने की सूचना दे दी। नानाराव अपने साथियों के साथ भागने में कामयाब रहे। लेकिन बेटी मैना नहीं निकल पाईं और वह अंग्रेजी सेना के हाथ लग गईं। अंग्रेजी सेना ने उन्हें और उनके साथ पकड़ी गईं 150 महिला क्रांतिकारियों ध्रुवटीले पर मैना को जिन्दा लकड़ियों के ढेर पर लिटा दिया और आग लगा दी। क्रूर अंग्रेजी फौज ने नाना की इकलौती बेटी को जिन्दा जलाने के बाद इसी टीले पर एकसाथ 150 महिलाओं को भी मौत की नींद सुला दिया था।
1977 में पड़ा मैनावती मार्ग
शहर से बिठूर तक बनी 17 किमी तक सड़क का निर्माण 1977 में कराया गया था। इसी दौरान इस सड़क का नाम मैनावती मार्ग रखा गया। इतिहासकार मुताबिक सरकार ने जहां से अग्रेज फौजी मैना को अरेस्ट किया और घसीटते हुए लाए, वहां तक सड़क का निर्माण कराया। फिर उस समय के राज्यपाल और सीएम ने मांर्ग का शिलान्यास किया था। 17 किमी का यह मार्ग आज भी मैना की मौत की गवाही दे रहा है। यहां के लोगों की मानें तो आज भी अंग्रेजों की बर्बरता की कई सच्चे सपूत छिपे हैं। राजेश पांडेय ने बताया कि मैना की गिनती महान क्रांतिकारियों में होती हैं। वीरांगना ने कम उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के मैदान में उतरी और अपने पराक्रम के बल पर उन्हें परास्त किया।
Published on:
26 Nov 2017 09:24 am
