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इंटरव्यू… वेदों से लेकर पुराणों तक भारतीय मनीषा अहिंसा पर टिकी हुई है – संत ललित प्रभ महाराज

-भारतीय संस्कृति और जैन धर्म के सिद्धांतों से बताई जीवन जीने की कला -संत ललितप्रभ महाराज से पत्रिका की विशेष बातचीत

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खंडवा

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Manish Arora

May 22, 2025

जीवन जीने की कला पर अपने प्रवचनों से लाखों परिवार में सुख बिखेरने वाले जैन संत मुनि ललितप्रभ महाराज का दो दिवसीय प्रवास बुधवार को खंडवा में हुआ। संत ललितप्रभ महाराज जोधपुर से हैदराबाद के लिए 1600 किमी का पद विहार कर रहे है। उनके साथ शिष्य डॉ. मुनि शांतिप्रय सागर महाराज भी विहार में है। संत ललितप्रभ महाराज ने पत्रिका से विशेष साक्षात्कार में लोगों को मन की शांति और सुखमय जीवन जीने का संदेश दिया।

प्रश्न 1. वैश्विक स्तर पर बढ़ते संघर्ष और युद्धों को देखते हुए, जैन धर्म का अहिंसा और करुणा का संदेश विश्व शांति में कैसे योगदान दे सकता है?
उत्तर-
अहिंसा का संदेश सिर्फ जैन धर्म का नहीं है, पूरी भारतीय संस्कृति का है। वेदों से लेकर आगम तक और पुराणों से लेकर पिटक तक भारतीय मनीषा जिस बिंदु पर टिकी हुई है वह अंहिसा है। महावीर स्वामी ने अपने समय विशुद्ध अहिंसा का आचरण किया था। महात्मा गांधी ने उसी अहिंसा को अपना शस्त्र बनाकर देश का आजादी दिलाई थी। इसमें कोई दो मत नहीं है कि दुनिया को अहिंसा का जीवन जीना चाहिए। अहिंसा का विकल्प ही मानवता, भाईचारा, परिवार है। अहिंसा का मतलब ये नहीं कि हिंसा मुक्त जीवन जीए, बल्कि अपनी ताकत का उपयोग दूसरों की भलाई में करें।

प्रश्न 2. आज के आधुनिक युग में जैन धर्म के जैसे अहिंसा और अपरिग्रह, को आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कैसे लागू किया जा सकता है?
उत्तर-
भागदौड़ भरी जिंदगी में अहिंसा, प्रेम, शांति, मिठास का समावेश यदि मनुष्य अपने जीवन में करेगा तो भागदौड़ तो रहेगी, लेकिन मन की अशांति नहीं रहेगी। अपरिग्रह का ये मतलब ये नहीं कि आप धन नहीं कमाओं, बल्कि आकूत धन कमाओं और उसे मानव कल्याण में लगाओ। धन को कमाना या न कमाना परिग्रह य अपरिग्रह नहीं है, धन के प्रति आसक्ति रखना अपरिग्रह है। आपाधापी भरी जिंदगी में इंसान अपनी थोड़ी से इच्छाओं को कम करें। जो भी कमाया यहीं छोडकऱ जाना है।

प्रश्न 3. आजकल लोग तनाव, अवसाद, आत्महत्या, चिंता और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रहे हैं। इनसे निपटने के लिए जैन दर्शन क्या समाधान सुझाता है?
उत्तर-
सदा से ये मनुष्य के पिछलग्गु रहे है, सौ साल पहले भी क्रोध, चिंता, अवसाद, मानसिक संताप थे, आजकल ये बढ़ा है। भगवान पर तो भरोसा है, लेकिन धैर्य नहीं रख पाते है। बच्चे पढ़ाई के लिए जाते है असफल हो जाते है और गंभीर कदम उठाते है। बच्चों पर अपनी अपेक्षाएं न ढोले, पड़ोस के बच्चे ने 95 प्रतिशत अंक लाए तो उसे भी 96 प्रतिशत अंक ही लाना है। इसे प्रोत्साहित करना नहीं बल्कि बच्चों को हतोत्साहित करना है। हर बच्चे की अपनी अपनी प्रतिभा होती है। जो बच्चा जैसा है उसके मापदंड को तौलते हुए अपेक्षा पाले।

प्रश्न 4. आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया के युग में, लोग अपने भीतर की शांति कैसे बनाए रख सकते हैं?
उत्तर-
भीतर की शांति को पाने के लिए न तो आधुनिक युग चाहिए, न ही पुराना युग चाहिए, सिर्फ मन की शांति चाहिए। मेरा मन ही जगत है उसे सुधारिए। मन की शांति का सबसे पहला नियम है आदमी के अंदर धैर्य। अनचाहा हुआ तो भी आनंद है, मनचाहा हुआ तो भी आनंद है। मन की शांति के लिए पहला नियम बनाना पड़ेगा लोड मत लो, जब भी देखो आधा गिलास भरा हुआ देखो। किसी से अपेक्षा मत पालो, जब जहां जो हो जाए उसका आनंद लो। दो दिन सफलता की बजाए शांति की जिंदगी जीवन जीने का आनंद ले।