
चौंकाने वाला खुलासा: एक साल में कोटा से पलायन कर गए 1100 से ज्यादा परिवार, कहां गए किसी को नहीं खबर...
विनीत सिंह@कोटा.
सौ दिन रोजगार की गारंटी, ( 100 days employment guarantee scheme ) घर से लेकर शौचालय बनाने तक का आश्वासन और कृषि के नवाचार जैसी तमाम लोक लुभावनी योजनाएं भी गांवों से गरीबों का पलायन रोक नहीं पा रही हैं। ( Peoples Migration from kota ) आलम यह है कि पिछले एक साल में ही गरीबी रेखा से नीचे जीवन (बीपीएल) यापन करने 1,116 लोग कोटा जिले के गांवों से पलायन कर गए। ( mgnrega scheme in rajasthan )
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वर्ष 2011 में हुई आर्थिक जनगणना ( economic census ) के आधार पर कोटा जिले के गांवों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन वाले 25,872 लोग चिन्हित किए थे। यह वो लोग थे जिनके पास न तो रोजगार ( Employment ) और आय के साधन थे और ना ही अपना मकान। गणना के आधार पर बीते तीन सालों में सरकार ने 10,541 लोगों को प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना ( Prime Minister Rural Housing Scheme ) के तहत मकान बनाकर दे दिए और सभी लाभार्थियों का जीवन स्तर सुधरने का दावा कर बीपीएल से बाहर कर दिया।
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3381 लोगों को किया अपात्र घोषित
प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के चौथे चरण के लिए बनी पात्रों की सूची के आधार पर सरकार ने पहली बार ऐसे लोगों की छटनी कराई जिनका जीवन स्तर सुधरने के कारण वे आवास निर्माण के लिए तय बीपीएल मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हों। आर्थिक जनगणना के आधार पर तैयार सूची में शामिल लोगों को जब इन मानकों पर कसा गया तो जिलेभर के गांवों से 3381 लोगों को अपात्र घोषित कर दिया। इनमें से 2,265 लोग ऐसे थे जिनकी या तो मृत्यु हो गई या फिर उन्होंने अपने जीवन स्तर में सुधार कर पक्का मकान बना लिया, सरकारी नौकरी लग गई या फिर सरकार की किसी और योजना से लाभ हासिल कर लिया।
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नाकाम साबित हो रही सरकारी योजनाएं
वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. गोपाल सिंह इसके पीछे सीधे तौर पर भूख, रोजगार और सुविधाओं के आकर्षण को जिम्मेदार ठहराते है, वे कहते हैं कि गांवों में औसतन एक आदमी को 2400 कैलोरी पर हर रोज होती है, लेकिन आमदनी न होने के कारण आधा भी नहीं मिल पाता। सरकार मनरेगा में 100 दिन के रोजगार की गारंटी का भले ही दावा क्यों न करें, लेकिन भौतिक उपलब्धता के आधार पर हुए अब तक के सर्वे बताते हैं कि राजस्थान के मनरेगा मजदूरों को अधिकतम 50 से 60 दिन ही रोजगार मिल पाता है। काम मिल भी जाए तो बिना रिश्वत दिए भुगतान नहीं होता। जबकि किसी भी इंसान को गुजर-बसर के लिए नियमित आय चाहिए। महज मकान देने या शौचालय बनवाने से जीवन नहीं चल सकता। ऊपर से न्यूनतम स्वास्थ्य और शिक्षा का बंदोबस्त न होने के साथ ही शहरों में कम से कम दैनिक मजदूरी मिलने और न्यूनतम आम सुविधाओं की आसान उपलब्धता का आकर्षण उसे शहरों की ओर खींच लाता है।
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ग्राम सभा के अनुमोदन के बाद मिलेगा मकान
राज्य स्तरीय जांच के बाद अपात्रों को सूची से बाहर करने के बाद भी पात्रों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना में मकान मिलना आसान नहीं। जिला परिषद के एक्सईएन लोकेश दाधीच बताते हैं कि राज्य स्तर से मिली पात्रता सूची पंचायत समितियों को भेजी जाएगी। वह ग्राम सभाओं में इसका अनुमोदन करावा कर फिर से आवास सॉफ्ट पर अपलोड कर राज्य स्तर पर ऑनलाइन किया जाएगा। इसके बाद प्राथमिकता के आधार पर 5,419 लाभार्थियों का चयन किया जाएगा। जो लोग रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन कर गए हैं यदि वह ग्राम सभा के अनुमोदन से पहले गांव लौट आते हैं तभी उनके आवेदन पर विचार किया जाएगा। नहीं तो उन्हें भी अपात्र घोषित कर दिया जाएगा।
Published on:
13 Jul 2019 08:30 am
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