
बारां. आदिवासी समुदाय ( Bhil community ) में बच्चों को गिरवी ( Pledged children ) रखे जाने के मामले में एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ है। गिरवी रखे जाने वाले बच्चों की उम्र 10 से 14 साल होती है। रेबारी लोग ( rabari community ) कम उम्र के बच्चों को ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि ये कम खाते हैं और ज्यादा काम करते हैं। कम खाना देते हैं तो रात में जंगली जानवरों से भेड़, ऊंटों की चौकसी सही होती है। रात भर बच्चे भूख से बिलखते रहते हैं। सुबह होते ही वापस काम पर भेज दिए जाते हैं। कई बच्चों का बचपन भेड़ चराने में बीत जाता है। यह बच्चे एक वर्ष में एक बार ही घर आते हैं।
Read More: सनसनीखेज खुलासा: राजस्थान में यहां पेट पालने के लिए मां-बाप 30 हजार में गिरवी रख देते हैं अपने बच्चे
दस रुपए के स्टाम्प पर लिखा-पढ़ी
बच्चों को गिरवी रखने का खेल दलालों के माध्यम से होता है। दलाल दोनों पक्षों को मिलवाता है और दोनों पक्षों से दलाली वसूल करता है। कुछ मामलों में दस रुपए के स्टाम्प पर लिखा पढ़ी होती है। ज्यादातर मामलों में जुबान पर यह पूरा मामला चलता है। जब बच्चे को गिरवी रखा जाता है उस समय कुछ रुपया चुका दिया जाता है। बाकी रुपया रेबारी तीन-चार किस्तों में देते हैं।
Read More: बेटे की आत्मा लेने 2 साल बाद एमबीएस पहुंचे परिजन, तांत्रिकों ने किया अनुष्ठान, टोना-टोटके से अस्पताल में मचा हड़कम्प
क्या करें गांव में काम नहीं है
नाम नहीं छापने की शर्त एक अभिभावक ने बताया कि सरकार की योजनाओं का आदिवासी इलाकों में ज्यादा लाभ नहीं मिला है। हमारे पास खेती के योग्य ज्यादा जमीन नहीं है। वनों की उपज से जो कुछ आय होती है, उसी से पेट पलता है। बच्चों का पेट पालने के लिए ही उन्हें रेबारियों को सौंप देते हैं। इस बात का दुख हमें भी होता है कि स्कूल जाने व खेलने-कूदने की उम्र में उन्हें काम करना पड़ता है।
Read More: बारां एसीबी की बड़ी कार्रवाई, खनन विभाग का सर्वेयर 10 हजार की रिश्वत लेता रंगे हाथ गिरफ्तार
कोई मामला सामने आएगा तो जांच कराएंगे
अगर कहीं रेबारियों द्वारा बच्चों को भेड़ों, ऊंटों को चराने का मामला सामने आता है तो इसकी मौके पर जाकर जांच करवाई जाएगी। साथ ही ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी जो बच्चों से भेडं़े चराने का काम करवा रहे हैं।
-कैलाश गुर्जर, उपखंड अधिकारी शाहाबाद