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World Heritage Day: अजीमो शान की गवाही देता तबाही का ये मंजर, मिट गया 1200 साल पुराना कोटा का भव्य शहर मंदरगढ़ का वजूद

जिन गलियों में कभी रौनक बरसती...आज सन्नाटा है... करीने से बसाई गईं भव्यता का प्रतीक वो बस्तियां...आज खंडहर हो चुकी है।
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कोटा

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Zuber Khan

•

Apr 18, 2018

World Heritage Day:

कोटा . जिन गलियों में कभी रौनक बरसती...आज सन्नाटा है... करीने से बसाई गईं भव्यता का प्रतीक वो बस्तियां...आज खंडहर हो चुकी... जहां धर्म पला, सभ्यता फली और समाज का विकास हुआ...900 साल से भी ज्यादा पुराना शहर...आज अपनी पहचान के लिए तारीखों का मोहताज है। सैकड़ों साल पहले मालवा से निकलने वाला रास्ता दरा की घाटियों के बीच से कोटा पहुंचता था।

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मीलों तक सीना ताने खड़े पत्थरों पर घने जंगलों ने तो जड़ें जमा ली थीं, लेकिन दूर-दूर तक इंसानी बस्तियों का नामोनिशान न था। ...तब कोटा से करीब 48 किमी दूर दो पहाडिय़ों के मिलन से बनी घाटी और चार किमी के घेरे में साल भर मौजूद बरसाती पानी की रमणीयता ने करीब हजार साल पहले नागा साधुओं को डेरा डालने पर विवश कर दिया। जिनकी समाधियों के निशान अब भी इस इलाके में बिखरे पड़े हैं।

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...और बस गया मंदरगढ़
12 वीं सदी में मालवा की सत्ता राजा नरबर्मन के हाथों में आई तो इस जगह की खूबसूरती से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहां 108 मंदिरों का निर्माण कराने के साथ ही एक भव्य नगर बसाया, नाम रखा... मंदरगढ़। अपने प्रतिनिधि के तौर पर उन्होंने राजा श्रीहर को यह इलाका सौंपा। श्रीहर ने राज्य विस्तार के लिए तमाम लड़ाइयां जीती और उन्हें अपने स्वामी को समर्पित करने के लिए 3 दिसंबर 1107 ई. को यहां एक और भव्य शिवमंदिर की स्थापना कराई। इतिहासविद फिरोज अहमद बताते हैं कि इसी शिवालय में स्थापित किए गए श्रीहर के शिलालेख ने सैकड़ों साल बाद भीमंदरगढ़ की पहचान जिंदा रखी।

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बदल गई पहचान
500 साल तक मंदरगढ़ की गलियां गुलजार रहीं। बाद में भव्यता ही इसकी दुश्मन बन गई। संपदा की चाह में मंदिरों पर हमले होने लगे, देखते ही देखते पूरा शहर उजड़ गया। बावजूद इसके, इलाका ज्यादा वक्त वीरान न रह सका। 17 वीं शताब्दी में कोटा के पहले महाराव माधोसिंह ने मंदरगढ़ के खंडहरों में फिर से जान फूंकी, नाम नया हो गया...मधुकरगढ़।

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कुरेदते ही झांकती प्रतिमाएं
जरा सी मिट्टी खोदने पर मंदरगढ़ की जमीन आदमकद प्रतिमाएं उगलने लगती हैं। वक्त की गर्द हटी तो दर्जनों दबी प्रतिमाएं बाहर झांकने लगीं। इनमें से सिर्फ भगवान विष्णु की प्रतिमाओं की पहचान हो सकी। यहां एक पहाड़ी पर भगवान विष्णु और शिव का विशाल मंदिर आज भी है। दूसरी पहाड़ी पर शिव मंदिर स्थापित है, लेकिन बीच घाटी में आशापुरा मंदिर के खंडहर और गोराजी का अखंड मंदिर स्थापित है, जहां आज भी भैरव की पूजा होती है।

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बूंदी के राजाओं को दी शरण
वर्ष 1739 में राव बुद्धसिंह की मृत्यु के बाद जब जयपुर रियासत की बूंदी पर नजर टेढ़ी हुई तो कोटा महाराव दुर्जनशाल ने उनके दोनों बेटों उम्मेद सिंह और दीप सिंह को यहीं पनाह दी। सवाई जयसिंह की मौत के बाद सन् 1744 में मंदरगढ़ की फौज ने ही बूंदी रियासत पर उम्मेद सिंह को दोबारा कब्जा दिलवाया, लेकिन इसके बाद मंदरगढ़ फिर उजड़ गया।

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शिलालेखों ने बचाया वजूद
मंदरगढ़ पर कई आपदाएं आईं, गनीमत रही कि पत्थरों पर दर्ज हर्फों में शहर की पहचान और तारीख बची रही। यह दरा के जंगलों में भटके कर्नल जेम्स टॉड को दिखे। उन्होंने सन् 1821 में मंदरगढ़ को इतिहास के पन्नों में जगह दी, लेकिन वे दोनों शिलालेख अपने साथ ले गए। टॉड के बाद इतिहासकार एसआर खान ने अपनी किताब हाड़ौती के बोलते शिलालेखों में इनका मूल पाठ प्रकाशित किया। यहां अब भी अहम् शिलालेख पड़े हैं। संवत 1716 के एक शिलालेख में किसी रानी के सती होने का जिक्र है और संवत 1160 के शिलालेख में नागा साधु के समाधि लेने का।

आदर्श 'नगर योजना
मंदरगढ़ की नगर योजना आज की स्मार्ट सिटी परिकल्पना को भी मात देती नजर आती है। यहां भग्नावेश तीन श्रेणियों में बंटे हैं। शाही परिवार के लिए परकोटे के अंदर सुरक्षा चौकियों से युक्त एक और परकोटा बनाकर महल का निर्माण किया गया है। विष्णु मंदिर के पास आवासीय बस्ती के खंडहरों में दो कमरे, रसोई, स्टोर और शौचालय बना है। आपस में जुड़े इन मकानों के बीच से रास्ता है। जिसके किनारे सभी शौचालयों की नालियां आपस में जुड़ी हैं। तीसरी श्रेणी मंदिर के अहाते में बने एक कमरे के भवनों की है।