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गैंगरेप मामला: कोर्ट ने माना पुलिस उपाधीक्षक ने नहीं निभाया अपना कर्तव्य, जांच में छोड़ी ये कमियां

युवती से सामूहिक बलात्कार मामले में पुलिस द्वारा एफआर लगाने के मामले में कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक भंवरसिंह हाड़ा ने कर्तव्य की उपेक्षा की है।
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कोटा

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Zuber Khan

•

May 05, 2019

Land dispute big decision on satna court jamin vivad kyo hota hai

Land dispute big decision on satna court jamin vivad kyo hota hai

कोटा. युवती से सामूहिक बलात्कार जैसे संगीन मामले में पुलिस उपाधीक्षक द्वारा जांच में गंभीर लापरवाही बरते हुए मामले में एफआर लगाने को कोर्ट ने तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक की कर्तव्य पालन के प्रति उपेक्षा व लापरवाही करार दिया। न्यायालय ने तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक भंवरसिंह हाड़ा की जांच पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, जांच में शुमार तथ्य आरकेपुरम निवासी अंकित के निवास से 8-10 किमी दूर ऑटो को खड़ा रखना अनुसंधान को संदिग्ध बताया।

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अनुसंधान अधिकारी द्वारा ऑटो के कोई फोटो भी पेश नहीं करने, पीडि़ता की मां द्वारा गवाह पड़ोसन नफीसा का मोबाइल व सिम चोरी होने के तथ्य के मामले में पुलिस में कोई मौखिक व लिखित शिकायत नहीं होना माना। साथ ही, आरोपियों को युवती द्वारा धमकाने के मामले में भी पुलिस में मौखिक व लिखित शिकायत दर्ज नहीं है। ऐसे में पीडि़ता द्वारा आरोपियों के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज करवाने की बात सारहीन मानी।

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जांच में ये मानी प्रमुख कमियां
अनुसंधान अधिकारी ने पीडि़ता के मोबाइल की कॉल डिटेल प्रस्तुत नहीं की। उन्होंने चिकित्सकीय परीक्षण में पीडि़ता के साथ बलात्कार होना व चोट होना नहीं माना। जबकि इस संबंध में पीडि़ता के खरोंच के निशान व कपड़ों पर मिले निशान को भी नजरअदांज किया गया। इसके अलावा पीडि़ता के कपड़े व मेडिकल ज्यूरिष्ट द्वारा सीलबंद दो शीशी की एफएसएल जांच तक के लिए जमा नहीं करवाई गई। ऐसे में न्यायालय ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत एफआर को अस्वीकार कर प्रस्तुत प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करने योग्य मानते हुए स्वीकार किया।

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पुलिस ने इस आधार पर लगाई एफआर, कोर्ट ने किया खारिज
न्यायालय में प्रस्तुत की एफआर में पुलिस द्वारा प्रकरण में निकट चल रहे शादी समारोह में गश्त कर रहे कांस्टेबलों को घटना की जानकारी नहीं होने, आरोपियों की मोबाइल लोकेशन के आधार पर उनके घटनास्थल पर नहीं होने, आरोपियों के पक्ष में गवाही, पीडि़ता से बलात्कार व बदन पर चोट नहीं होने को आधार मानते हुए एफआर लगाने का तर्क दिया गया। इसे न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।