
पीएम मोदी ये गलती पड़ रही भारी, 10 गुना ज्यादा कीमत चुका रहे किसान
नई दिल्ली। कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों के शीर्ष संगठन पेस्टिसाइट्स मैन्युफैक्चरर्स एंड फॉर्म्युलेटर्स एसोसियेशन ऑफ इंडिया (पीएमएफएआई) और कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया स्मॉल एंड मीडियम पेस्टिसाइट्स मैन्युफैक्सरर्स (सीएपीएमए) ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2007 में टेक्निकल ग्रेड के पंजीयन के बगैर तैयार कीटनाशक फॉर्म्युलेशन के आयात की मंजूरी दिए जाने से देश में 10 बड़ी विनिर्माता कंपनियां बंद हो चुकी हैं या बेच दी गई हैं। इस कारण आयातित महंगे कीटनाशकों से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। इन दोनों संगठनों के अध्यक्ष प्रदीप दवे ने दावा करते हुए कहा कि वर्ष 2007 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने 40 वर्ष पुरानी नीति में बदलाव कर दिया था और टेक्नीकल ग्रेड की लाइसेंसिंग व्यवस्था को समाप्त कर दिया था, जिसके कारण देश में यह स्थिति बनी है। उन्होंने दावा किया कि पूरी दुनिया में कीटनाशकों को लेकर इस तरह की नीति किसी भी देश में नहीं है जहां मात्र दो पेटेंटेड कीटनाशकों की बिक्री विदेशी कंपनियां कर रही है लेकिन भारत में बिक रहे 120 से अधिक कीटनाशकों की कीमतों में वैश्विक अनुपात में कई गुना अधिक कीमतें वसूल रही है।
कई गुना महंगे मिल रहे आयातित कीटनाशक
फसलों में लगने वाली विभिन्न तरह की बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले पयाराजोसोफोरेन ईथाईल 70 डब्ल्यू की आयातित कीमत 2200 रुपए प्रति किलोग्राम है जिसे किसानों को 28380 रुपए प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जाता है। इसी प्रकार से बिसपैरिबैक सोडियम 10 फीसदी एससी का आयातित मूल्य 670 रुपए प्रति लीटर है जिसे किसानों को 6640 रुपए लीटर की दर से बेचा जा रहा है। उन्होंने भारतीय कीटनाशक बाजार का उल्लेख करते हुये कहा कि अभी यह 20 हजार करोड़ रुपए का है लेकिन 17 हजार करोड़ रुपए का आयात किया जाता है। इससे न सिर्फ विदेशी मुद्रा देश से बाहर जाती है बल्कि किसानों को भी कई गुना अधिक कीमतें चुकानी पड़ रही है।
इन कंपनियों ने बेचे अपने संयंत्र
दवे ने कहा कि सरकार ने टेक्निकल ग्रेड के पंजीयन के बगैर कीटनाशक के आयात को मंजूरी दी जिससे आयातकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मनमाने दाम पर कीटनाशक बेचने की छूट मिल गई। उन्होंने कहा कि इसको लेकर उनके संगठन मोदी सरकार को भी कई बार ज्ञापन सौंप चुके हैं लेकिन कुछ नहीं हुआ है जिसके कारण वर्ष 2007 से लेकर अब तक नौ प्रमुख कंपनियां बंद हो चुकी है या बिक चुकी है। इससे हजारों लोगों की नौकरियां भी गई हैं। उन्होंने कहा कि कीटनाशक उत्पाद कंपनी बायर ढाणे और अंलेकेश्वर स्थित दो संयंत्रों को बेच चुकी है और बिलाग स्थित संयंत्र अपनी क्षमता का मात्र 50 फीसदी काम कर रहा है। डॉव केमिकल्स के संयंत्रों में भी लगभग उत्पादन बंद हो चुका है। बीएएसएफ ने ढाणे स्थित अपने संयंत्र में लगभग टेक्नीकल उत्पादन बंद कर चुकी और उसने पेंडिमेथालीन उत्पादन संयंत्र को बेच दिया है। मोनसेंटो भी विनिर्माण संयंत्र बंद कर चुकी है। सिजेंटा ने भी अपने संयंत्र बेच दिए हैं।
कीटनाशक उद्योग के लिए विफल रहा मेक इन इंडिया
दवे ने मोदी सरकार के मेक इन इंडिया अभियान को कीटनाशक उद्योग के लिए पूरी तरह से विफल बताते हुए कहा कि जब तक देश में टेक्नीकल पंजीयन नहीं होगा, तब तक किसानों को सस्ती कीटनाशक नहीं मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश पर दो कीटनाशकों के लिए ऐसी व्यवस्था की गई है जिससे उनका भारत में विनिर्माण होने से उनकी कीमतों में भारी कमी आई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बड़े आयातक और बहुराष्ट्रीय कंपनियां टेक्नीकल पंजीकरण के प्रावधान से परेशान थी जिसके कारण वे इसमें छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रहे थे और वर्ष 2007 में वे इसमें सफल हो गए।
नए पेस्टिसाइट्स प्रबंधन विधेयक से भी नहीं मिलेगी राहत
दवे ने कहा कि कीटनाशक अधिनियम 1968 के तहत किसानों के हितों की रक्षा के लिए उसके आयात, विनिर्माण, बिक्री, परिवहन, वितरण और उपयोग को विनियमित किया गया था और इसमें दो ऐसे प्रावधान हैं जिससे भारतीय विनिर्माताओं को पेटेंट की अवधि में भी कीटनाशकों के निर्माण की अनुमति मिल जाती है ताकि पेटेंट की अवधि समाप्त होने पर यथाशीघ्र उसे भारतीय बाजार में लाया जा सके और किसानों का उसका लाभ मिल सके। उन्होंने पेस्टिसाइट्स प्रबंधन विधेयक 2017 के मौसदे में कई तरह की खामियां होने का उल्लेख करते हुए कहा कि कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने गत फरवरी में इस मसौदे पर हितधारकों की राय मांगी थी। उन्होंने कहा कि इस नए विधेयक में भी कीटनाशकों के आयात के लिए टेक्नीकल ग्रेड के पंजीयन को जरूरी नहीं बनाया गया है जिससे घरेलू निर्माताओं के स्थान पर आयातकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होगा। इसके साथ ही कीटनाशकों का शेड्यूल भी इस मसौदे में नहीं है तथा पेस्टिसाइट फॉर्म्युलेशन की परिभाषा और पंजीयन की प्रक्रिया को इसमें स्पष्ट नहीं किया गया है। इस तरह यह नया कानून भी वर्ष 2007 में किए बदलाव पर ही आधारित है।
Published on:
10 Jun 2018 04:50 pm
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