नेशनल स्टाॅक एक्सचेंज पर निवेशकों को ऐसे दिया जाता था धोखा, बड़े अधिकारी ऐसे खेलते थे काला खेल

नेशनल स्टाॅक एक्सचेंज पर निवेशकों को ऐसे दिया जाता था धोखा, बड़े अधिकारी ऐसे खेलते थे काला खेल

Ashutosh Kumar Verma | Publish: May, 02 2019 07:07:00 AM (IST) | Updated: May, 02 2019 07:24:45 AM (IST) कॉर्पोरेट

  • एनएसई पर को-लोकेशन के जरिए कुछ सर्वर पर विशेष लाभ पहुंचाने का अरोप में सेबी ने 625 करोड़ रुपए जुर्माना लगाया।
  • एनएसई के अधिकारी व तकनीकी सेवा देने वाली कंपनी की मदद से करोड़ों का खेल करते थे ब्रोकर्स।
  • 6 महीने में कैपिटल मार्केट का एक्सेस नहीं मिलने के बाद एनएसई पर ट्रेडिंग नहीं होगी प्रभावित।

नई दिल्ली। करीब दो दिन पहले भारत के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज यानी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ( NSE ) पर बाजार नियामक सेबी ( Security Exchange Board of India ) ने 625 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। NSE पर को-लोकेशन ( Co-Location ) के जरिए कुछ सर्वर पर विशेष लाभ पहुंचाने का अरोप लगा था। एनएसई की को-लोकेशन सुविधा के माध्यम से उच्च आवृत्ति वाले कारोबार में अनियमितता के आरोपों की जांच सेबी के द्वारा की जारी है। इस मामले में कंपनी के दो पूर्व प्रमुख अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई है। आइए जानते हैं कि आखिर क्या है को-लोकेशन और कैसे बड़े अधिकारी इसकी मदद से निवेशकों को धोखा देते थे।

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क्या है को-लोकेशन?

को-लोकेशन ब्रोकर्स को अतिरिक्त फीस देने पर अपने सर्वर के नजदीक ऑपरेट करने की अनुमति देता है। सर्वर की नजदीकी होने की वजह से ब्रोकर्स के लिए डाटा ट्रांसमिशन में कम समय लगता है। ऐसे में इन ऑपरेटर्स को ऑर्डर देने में बेहद ही कम समय लगता है। इस प्रकार को-लोकेशन की सुविधा लेने वाले ब्रोकर्स को एडवांटेज मिलता है।

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क्या है पूरा मामला?

साल 2014-15 में एक व्हिलिब्लोवर ने भारतीय विनियामक एंव प्रतिभूति बोर्ड ( SEBI ) को जानकारी दी थी कि कुछ ब्रोकर्स एनएसई की अधिकारियों की मदद से को-लोकेशन सुविधा का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। उस दौरान अपने मेंबर्स को डेटा ट्रांसफर करने के लिए एनएसई टिक-बाई-टिक ( TBT ) सर्वर प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करती थी। इस प्रोटोकॉल की सबसे खास बात इसके जानकारी जारी करने का तरीका था। आम डेटा प्रोटोकॉल के तहत नेटवर्क पर कनेक्टेड सभी यूजर्स को एक साथ डेटा भेजा जाता था। लेकिन, TBT ट्रांसमिशन तकनीक के तहत यूजर्स को डाटा इस ट्रांसफर उस हिसाब से होता था जिस हिसाब से उन्होंने ऑर्डर दिए है। इसका मतलब है कि जिस ब्रोकर ने पहले ऑर्डर दिया, उसे सबसे पहले डेटा ट्रांसफर किया जाता था। कुछ ब्रोकर्स इसी का फायदा उठाने के लिए एनएसई अधिकारियों व ऑम्नेसिज टेक्नोलॉजी की मदद से दूसरे ब्रोकर्स की तुलना में पहले डेटा हासिल कर लेते थे। ऑम्नेसिज ही वो कंपनी है जो एनएसई को तकनीकी सुविधा मुहैया कराती है। सेबी ने अपनी जांच में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर संपर्क इंफोटेनमेंट के साथ ओपीजी सिक्योरिटीज, जीकेएन सिक्योरिटीज और Way2health इस तरह की ट्रेडिंग को अंजाम देते थे। इन ब्रोकर्स को एनएसर्इ सर्वर पर सबसे पहले एक्सेस मिल जाती थी।

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कैसे हुआ ओपीजी इस स्कैप में कामयाब?

ओपीजी एनएसई के बैकअप सर्वर का एक्सेस पाने में कामयाब रहा। एक्सचेंज बैकअप सर्वर को मेंटेंन करता है ताकि किसी तकनीकी अड़चन की वजह से ऑपरेशंस पर कोई असर नहीं पड़ सके। इस बैकअप सर्वर ट्रैफिक या तो बिल्कुल नहीं होता या फिर बेहद कम होता है। काम के आम दिनों में जब मेन सर्वर काम करता है, तब भी बैकअप सर्वर पर किसी भी डेटा को भेजा या रीसिव किया जा सकता है। सेबी ने कहा है कि ओपीजी व अन्य ब्रोकर्स इसी का फायदा उठाते थे।

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क्या एनएसई ने नियमों को उल्लंघन किया?

एक्सचेंज ने ओपीजी समेत दूसरे ब्रोकर्स को इस सर्वर से डेटा एक्सेस करने में मदद की ताकि उन्हें सबसे पहले और सबसे तेजी से डेटा मिल सके। एनएसई ने इस बात का भी ध्यान नहीं दिया संपर्क इंफोटेनमेन्ट के पास डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकॉम लाइसेंस डार्क फाइबर कनेक्टिविटी का लाइसेंस है या नहीं। डार्क फाइबर की मदद से कम डिस्टॉर्शन में अधिक बैंडविथ का डेटा ट्रांसफर किया जाता है। इसका सीधा मतलब है कि एक्सचेंज पर सबसे तेजी से डेटा एक्सेस किया जा सकता है। सेबी ने ब्रोकर्स ही नहीं बल्कि एनएसई में काम करने वाले कुछ बड़े अधिकारियों को भी इसमें सम्मिलित पाया है। इसमें एनएसई की पूर्व सीईओ चित्रा रामाकृष्ण, पूर्व एमडी रवि नारायण, कोलो डिपार्टमेंट के पूर्व हेड देवीप्रसाद सिंह समेत अन्य पर कार्रवाई की है। सेबी ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा है कि जरूरी कार्यप्रणाली के तहत सही प्रोटोकॉल को नहीं फॉलो किया गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए एनएसई पर 687 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है। इसमें ब्याज भी शामिल है।

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सेबी की इस कार्रवाई से एनएसई पर क्या पड़ेगा असर?

एनएसई को 687 करोड़ रुपए जमा करने होंगे और वो अगले छह महीनों तक कैपिटल मार्केट को एक्सेस नहीं कर सकती है। इसके बाद अब इसके आइपीओ साल के अंत तक के लिए लटक जाएंगे। हालांकि, इससे एनएसई की वैल्युएशन पर कुछ खास असर नहीं पड़ेगा। साथ ही एनएसई के पास इतना रिजर्व है कि वो इस जुर्माने को भर सकती है और इसके बावजूद भी वित्तीय तौर पर उसकी स्थिति मजबूत रहेगी। आपको एक बात यह भी बता दें कि सेबी के ऑपरेशन पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा और किसी पर तरह से नॉर्मल ट्रेडिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

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