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जेनरेशन गैप नहीं, हेल्थ गैप! Gen Z और Millennials लड़क‍ियां क्यों कर रही हैं PMS से ज्यादा संघर्ष

Gen Z: खासकर महिलाओं में PMS यानी प्री-मेंस्ट्रूअल सिंड्रोम अब पहले से कहीं ज्यादा गंभीर रूप में सामने आ रहा है। आधुनिक लाइफस्टाइल, लगातार बढ़ता स्ट्रेस और वर्कप्लेस की भागदौड़ ने Gen Z और Millennials लड़कियों के लिए।

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भारत

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MEGHA ROY

Sep 10, 2025

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Health gap between Gen Z and Millennials|फोटो सोर्स – Freepik

PMS In Women: आज की पीढ़ी को अक्सर जेनरेशन गैप के लिए जाना जाता है, लेकिन हेल्थ के मामले में यह “गैप” और भी ज्यादा गहरा दिखाई दे रहा है। खासकर महिलाओं में, जहां PMS यानी प्री-मेंस्ट्रूअल सिंड्रोम अब पहले से कहीं ज्यादा गंभीर रूप में सामने आ रहा है। आधुनिक लाइफस्टाइल, लगातार बढ़ता स्ट्रेस और वर्कप्लेस की भागदौड़ ने Gen Z और Millennials लड़कियों के लिए इस समस्या को और कठिन बना दिया है।

PMS क्या है और क्यों हो रहा है ज्यादा मुश्किल?

पीरियड शुरू होने से लगभग एक से दो हफ्ते पहले शरीर और मन में कई तरह के बदलाव PMS के रूप में सामने आते हैं। इसमें थकान, मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन, नींद की गड़बड़ी और खाने की आदतों में बदलाव आम लक्षण हैं। रिसर्च के मुताबिक, प्रजनन आयु वाली लगभग 75% महिलाएं किसी न किसी रूप में PMS का अनुभव करती हैं, लेकिन हर पांच में से एक महिला इतनी गंभीर स्थिति झेलती है कि उनकी डेली लाइफ बुरी तरह प्रभावित होती है।

Millennials: हसल कल्चर और स्ट्रेस का असर

आधुनिक समय की सबसे बड़ी चुनौती है हसल कल्चर हर वक्त काम में डूबे रहना और खुद को साबित करने का दबाव। देर रात तक लैपटॉप स्क्रीन पर काम करना, कम नींद लेना और लगातार परफॉर्म करने का प्रेशर शरीर के हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ देता है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जब स्ट्रेस लेवल बढ़ता है तो शरीर में कॉर्टिसोल का स्तर भी हाई रहता है। इसका सीधा असर नर्वस सिस्टम और रिप्रोडक्टिव हार्मोन्स एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन पर पड़ता है, जिससे PMS के लक्षण और भी तीखे हो जाते हैं।

वर्कप्लेस और सोशल प्रेशर

कामकाजी महिलाओं के लिए PMS की सबसे बड़ी मुश्किल है कि ऑफिस में इसे अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई बार लक्षण इतने परेशान करने वाले होते हैं कि आराम की जरूरत होती है, लेकिन छुट्टी लेना “कमजोरी” समझा जाता है। ऐसे में महिलाएं दर्द और असुविधा को नज़रअंदाज़ करती रहती हैं, जो लंबे समय में स्थिति को और बिगाड़ सकता है। समय रहते ध्यान न देने पर यही परेशानी PMDD (Premenstrual Dysphoric Disorder) जैसी गंभीर समस्या का रूप ले सकती है।

क्यों अलग है आज की पीढ़ी की स्थिति?

हमारी माएं और दादियां भी PMS से गुजरती थीं, लेकिन उनकी लाइफस्टाइल आज की पीढ़ी जैसी टॉक्सिक और तेज़-तर्रार नहीं थी। Gen Z और Millennials महिलाओं में एक ओर खुलकर PMS पर बात करने की आदत बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर स्ट्रेस, नींद की कमी और असंतुलित दिनचर्या ने लक्षणों को और ज्यादा जटिल बना दिया है। यही वजह है कि आज PMS सिर्फ एक शारीरिक परेशानी नहीं बल्कि मेंटल हेल्थ और वर्क-लाइफ बैलेंस से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

PMS से राहत कैसे पाई जा सकती है?

स्ट्रेस मैनेजमेंट

एक्सरसाइज तनाव को कम करने में मदद करते हैं।हर दिन 15–20 मिनट का मेडिटेशन कॉर्टिसोल लेवल को घटाता है।

नींद पूरी करना

सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करें और रिलैक्सिंग रूटीन अपनाएं और
7–8 घंटे की क्वालिटी नींद हार्मोनल बैलेंस के लिए जरूरी है।

हेल्दी डाइट

कैफीन और ज्यादा चीनी से बचें, ये मूड स्विंग्स बढ़ा सकते हैं। साथ ही डाइट में हरी सब्जियां, नट्स, सीड्स और ओमेगा-3 युक्त फूड्स शामिल करें।
मैग्नीशियम और विटामिन B6 सप्लीमेंट भी PMS के लक्षणों को कम कर सकते हैं.

रेग्युलर एक्सरसाइज

हल्की-फुल्की एक्सरसाइज या वॉकिंग ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करती है और थकान कम करती है।कार्डियो और योग का कॉम्बिनेशन PMS के लक्षणों को काफी घटा सकता है।

ओपन कन्वर्सेशन

ऑफिस और घर दोनों जगह PMS पर बात करने की जरूरत है। क्योंकि जब महिलाएं खुलकर अपने लक्षणों को शेयर करती हैं, तो न केवल सपोर्ट मिलता है बल्कि हेल्थ इश्यूज को समय रहते मैनेज करना आसान हो जाता है।