12 सितंबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

कॉरपोरेट लाइफ से पहाड़ों तक: सिंगापुर की ‘लग्जरी लाइफ’ कपल ने छोड़ी! प्रकृति बनी बच्चे की क्लासरूम

Singapore Couple Mountain Life: सिंगापुर की कॉरपोरेट जिंदगी छोड़कर गरिमा और आदित्य उत्तराखंड के गांव में बस गए। बेटे वेदास के लिए उन्होंने पारंपरिक स्कूलिंग की जगह प्रकृति के बीच ‘अनस्कूलिंग’ का रास्ता चुना है।
3 min read
Google source verification

भारत

image

Harshul Mehra

Sep 12, 2026

singapore couple left luxury corporate life mountains child nature school

कॉरपोरेट लाइफ से पहाड़ों तक। फोटो सोर्स- वीडियो ग्रैब इंस्टाग्राम (thebetterindia)

Singapore Couple Mountain Life: तेज रफ्तार कॉरपोरेट जिंदगी के बीच बहुत से लोगों के लिए शहर छोड़कर पहाड़ों में जाकर सुकून भरी जिंदगी जीना किसी सपने जैसा लगता है, लेकिन गरिमा और आदित्य ने इस सपने को हकीकत में बदल दिया। दोनों ने सिंगापुर की अपनी जिंदगी पीछे छोड़ी, अपनी 'लग्जरी लाइफ' छोड़ी और अपने बेटे वेदास की परवरिश के लिए उत्तराखंड के एक शांत गांव में बस गए।

उनकी कहानी सोशल मीडिया पर भी चर्चा में है। इंस्टाग्राम (Instagram) अकाउंट @lifeofmaai की ओर से शेयर किए गए एक वीडियो में उनके जीवन और बच्चे की परवरिश के इस अलग तरीके को दिखाया गया है। दंपती ने अपने बेटे को पारंपरिक स्कूल, होमवर्क, परीक्षा और रिपोर्ट कार्ड की व्यवस्था से दूर रखते हुए प्रकृति के बीच सीखने का माहौल देने का फैसला किया।

कॉरपोरेट जिंदगी से पहाड़ों तक का सफर

आदित्य का जन्म और पालन-पोषण शिमला के एक मिडिल क्लास परिवार में हुआ। कभी उनके लिए प्रोफेशनल सफलता का मतलब कॉरपोरेट सीढ़ी पर लगातार ऊपर बढ़ना था। कॉलेज की पढ़ाई के लिए वह दिल्ली आए, जहां उन्होंने फैशन मैनेजमेंट की पढ़ाई की। यहीं उनकी मुलाकात गरिमा से हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद गरिमा ने एक अच्छी सैलरी वाली नौकरी शुरू की। इस नौकरी के दौरान उन्हें ट्रेनिंग के लिए विदेश जाने के अवसर भी मिले। साल 2015 में दोनों ने शादी की। इसके बाद आदित्य की नौकरी की वजह से वे सिंगापुर चले गए। हालांकि, कुछ समय बाद कॉरपोरेट जिंदगी का दबाव उनके जीवन पर असर डालने लगा।

चाइल्ड साइकोलॉजी ने बदला नजरिया

गरिमा ने नौकरी छोड़कर चाइल्ड साइकोलॉजी की पढ़ाई शुरू की। इस पढ़ाई के दौरान बचपन, शिक्षा और बच्चों की परवरिश को लेकर दोनों का नजरिया बदलने लगा। जैसे-जैसे गरिमा इस विषय को समझती गईं, दंपती ने यह सवाल करना शुरू किया कि सफलता की पारंपरिक परिभाषा वास्तव में उनके परिवार के लिए सही है या नहीं। इसके बाद दोनों ने बच्चे के लिए ऐसी जिंदगी की कल्पना की, जिसमें वह प्रकृति के करीब रह सके, अपनी जिज्ञासाओं को तलाश सके और अपनी गति से चीजों को समझ सके।

8 साल तक की प्लानिंग, फिर छोड़ी नौकरी

कपल द्वारा सिंगापुर छोड़ने का फैसला अचानक नहीं लिया गया था। उनके इंस्टा (Instagram) अकाउंट lifeofmaai के अनुसार, आदित्य और गरिमा ने इस कदम के लिए करीब 8 साल तक प्लानिंग और रिसर्च की। 33 साल की उम्र में आदित्य ने अपनी नौकरी छोड़ दी और गरिमा के साथ उत्तराखंड चले गए। उस समय गरिमा मां बनने वाली थीं। दोनों की रुचि प्रकृति आधारित जीवन, पारंपरिक ज्ञान, जड़ी-बूटियों और शिक्षा के वैकल्पिक तरीकों में बढ़ती गई। वे अपने बच्चे को ऐसा माहौल देना चाहते थे, जहां कम उम्र में ही पारंपरिक स्कूलिंग के दबाव का सामना न करना पड़े। इसके बाद उत्तराखंड के बासगांव में उनका नया घर उनके इस नए जीवन का केंद्र बन गया।

न यूनिफॉर्म, न रिपोर्ट कार्ड और न तय सिलेबस

The Better India के मुताबिक, उनके बेटे वेदास ने कभी पारंपरिक स्कूल में पढ़ाई नहीं की। उसके लिए सीखना केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं है। उसका दिन प्रकृति के आसपास बीतता है। वह सूरज के साथ उठता है, पक्षियों की आवाज सुनता है, बारिश को देखता है और अपने आसपास की चीजों को तलाशता है।

वह पत्थरों से खेलता है, कीड़े-मकौड़ों और पौधों को देखता है, अपने खेल खुद बनाता है। यहां तक कि वह मिट्टी से पेंटिंग भी करता है। जो चीजें आम तौर पर सिर्फ खेल लग सकती हैं, गरिमा और आदित्य उन्हें बच्चे के लिए दुनिया को समझने और सीखने का माध्यम मानते हैं।

क्या है ‘अनस्कूलिंग’?

गरिमा और आदित्य अपने इस तरीके को ‘अनस्कूलिंग’ कहते हैं। इसमें बच्चे की रुचि, जिज्ञासा और सीखने की अपनी गति को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि कठोर अकादमिक ढांचे पर कम जोर रहता है। हालांकि, दंपती किताबों, परीक्षाओं या औपचारिक शिक्षा के पूरी तरह खिलाफ नहीं हैं। The Better India के हवाले से उन्होंने कहा कि वे बच्चों को बहुत जल्दी, बहुत ज्यादा और बिना सोचे-समझे पढ़ाई के लिए मजबूर किए जाने के खिलाफ हैं। उनका मकसद बेटे को शिक्षा से दूर रखना नहीं है, बल्कि पारंपरिक अकादमिक दबाव डालने से पहले उसके भीतर सीखने की स्वाभाविक रुचि विकसित होने की आजादी देना है।

प्रकृति के बीच बचपन को जी रहा वेदास

वेदास के लिए पहाड़ सिर्फ रहने की जगह नहीं हैं। उसके रोजमर्रा के अनुभव ही उसके सीखने का हिस्सा हैं। पक्षियों को सुनना, बारिश देखना, पौधों और कीड़ों को देखना, पत्थरों से खेलना, मिट्टी से पेंटिंग करना और कंपोस्ट तैयार करने में मदद करना उसके रोज के अनुभवों का हिस्सा हैं। उसके माता-पिता मानते हैं कि इन गतिविधियों के जरिए वह अपने आसपास की दुनिया को सीधे अनुभव करके समझ रहा है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने की फैसले की चर्चा

गरिमा और आदित्य की कहानी सोशल मीडिया पर भी लोगों का ध्यान खींच रही है। कई लोग कॉरपोरेट रेस से बाहर निकलकर प्रकृति और परिवार के साथ जिंदगी बिताने के उनके फैसले की सराहना कर रहे हैं। हालांकि, उनका यह तरीका हर परिवार के लिए उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन उनकी कहानी यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि क्या बचपन हमेशा क्लासरूम, स्क्रीन, परीक्षा और डेडलाइन के इर्द-गिर्द ही होना चाहिए, या बच्चे जिज्ञासा, खेल और अपने आसपास की दुनिया से भी सीख सकते हैं? वेदास के लिए फिलहाल पहाड़ उसकी क्लासरूम हैं, प्रकृति उसका खेल का मैदान है और रोजमर्रा की जिंदगी ही उसकी सीख का हिस्सा है।