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AC नहीं था फिर भी ठंडे रहते थे पुराने घर, जानिए आंगन और जालियों का साइंस

Bina AC Ke Ghar Thanda Kaise Rehte The: पुराने भारतीय घर बिना AC के भी ठंडे कैसे रहते थे? जानिए मोटी दीवारों, आंगन और जालियों के पीछे छुपा वैज्ञानिक कारण और traditional cooling techniques का विज्ञान।

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Traditional Indian House Cooling Techniques, Bina AC Ke Ghar Thanda Kaise Rehte The

बिना एसी के घर ठंडा कैसे रहता था(representative image) | image credit gemini

Traditional Indian House Cooling Techniques: गर्मी में घर को ठंडा रखने के लिए आज ज्यादातर लोग AC और कूलर का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन पुराने भारतीय घर बिना बिजली के भी अंदर से ठंडे रहते थे। इसकी वजह सिर्फ डिजाइन नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच थी। मोटी दीवारें, छोटे रोशनदान, बीच का खुला आंगन और जालीदार खिड़कियां घर के तापमान को नियंत्रित करती थीं। ये Traditional Indian House Cooling Techniques प्राकृतिक वेंटिलेशन और एयर फ्लो के सिद्धांतों पर आधारित थीं।

मोटी दीवारें और छोटी खिड़कियां (How Thick Walls and Small Windows Keep Houses Cool)

ज्यादातर लोगों को लगता है कि घर में बड़ी-बड़ी खिड़कियां होंगी, तो घर में हवा अच्छी आएगी और घर ठंडा रहेगा। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता है। गर्मियों में जब लू चलती है, तो ये गर्म हवाएं सीधे अंदर आकर घर को पहले से भी ज्यादा गर्म कर देती हैं। इसीलिए पुराने जमाने में घरों की दीवारें मोटी और खिड़कियां काफी छोटी बनाई जाती थीं।

मोटी दीवारें बाहर की गर्मी को अंदर आने से रोकती थीं। वहीं, छोटी खिड़कियों और संकरी openings से हवा की गति बढ़ जाती थी, जिससे वेंटिलेशन बेहतर महसूस होता था। इससे घर के अंदर अपेक्षाकृत ठंडक का अहसास होता था। इसे stack effect भी कहा जाता है, जिसमें गर्म हवा ऊपर उठती है और उसकी जगह अपेक्षाकृत ठंडी हवा अंदर आती रहती है।

इसलिए होते थे हर घर में आंगन (Why Traditional Indian Houses Had Courtyards for Cooling)

अगर आपने कभी किसी पुराने घर या हवेली को ध्यान से देखा होगा तो आपको घर के ठीक बीच में एक खुला आंगन बना दिखा होगा। यह आंगन सिर्फ उठने-बैठने या सामाजिक मेलजोल के लिए नहीं था, बल्कि घर के लिए एक नेचुरल एसी (AC) का काम करता था।

दरअसल, गर्मियों में जब आंगन के अंदर की हवा गर्म हो जाती थी, तो वह हल्की होकर ऊपर की तरफ निकल जाती थी। इससे नीचे एक खाली जगह यानी लो-प्रेशर जोन (Low-pressure zone) बन जाता था, जिसे भरने के लिए आसपास के कमरों की ठंडी हवा तेजी से वहां आ जाती है। इस वजह से पूरे घर में हर वक्त एक बढ़िया और ठंडी हवा का बहाव बना रहता था।

इसी ठंडक को और बढ़ाने के लिए कई लोग आंगन में छोटा सा फव्वारा भी लगाते थे। जब इस फव्वारे का पानी भाप बनकर हवा में उड़ता था (Evaporation), तो आसपास का पूरा माहौल एकदम ठंडा हो जाता था।

जाली का भी करते थे इस्तेमाल (How Traditional Jali Screens Provide Ventilation and Cooling)

गर्मी से बचने के लिए आंगन के अलावा 'जाली' डिजाइन का भी इस्तेमाल किया जाता था। इसलिए आपने कभी ना कभी पुरानी ऐतिहासिक इमारतों जैसे हवामहल, महलों या किलों में पत्थरों या लकड़ी पर बारीक नक्काशी वाली जालियां जरूर देखी होंगी। ये जालियां सिर्फ दिखावे या खूबसूरती के लिए नहीं थीं, बल्कि इनका मुख्य काम घर को ठंडा रखना था।

दरअसल, ये जालीदार डिजाइन बाहर से आने वाली तेज धूप को छान देती थीं, जिससे घर के अंदर सीधी धूप नहीं आ पाती थी। साथ ही, इनके बारीक छेदों से गर्म हवा लगातार ठंडी होकर घर में आती थी। जिससे घर का टेम्परेचर बाहर की तुलना में काफी कम होता था । इसके अलावा, जब धूप इन जालियों से छनकर अंदर आती थी, तो खूबसूरत परछाइयां भी बनाती थी।