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अमर मणि त्रिपाठी ने किया चुनाव लड़ने का ऐलान, पर क्या होगा ये आसान?

अमर मणि त्रिपाठी मर्डर के जुर्म में उम्रक़ैद भोग चुके हैं। योगी सरकार की ऐसी मेहरबानी रही, जिसका फायदा उन्हें मिला और समय से पहले रिहा हो गए। अब बाकी बची ज़िंदगी में वह एक बार फिर एमएलए बनना चाहते हैं। कहते हैं, जब वह मंत्री थे तो डॉन श्रीप्रकाश शुक्ल उन्हें अपनी जेब में रखता था।
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लखनऊ

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Vijay Kumar Jha

Sep 01, 2026

Madhumita murder convict amar mani tripathi will fight election

मधुमिता शुक्ला मर्डर केस में अमर मणि त्रिपाठी को पत्नी सहित उम्रकैद हुई थी, लेकिन दोनों की समय से पहले रिहाई हो गई। (इमेजिंग एआई से)

अमर मणि त्रिपाठी! नाम याद है या भूल गए? कभी यूपी सरकार के कद्दावर मंत्री हुआ करते थे। फिर एक कवयित्री मधुमिता शुक्ला के कातिल करार दिए गए और उम्र कैद हो गई तो राजनीतिक जीवन खत्म हो गया। अब जेल से बाहर आए हैं तो फिर से विधायक बनना चाहते हैं। उन्होंने 2027 में फरेंदा (महाराजगंज) से विधान सभा चुनाव लड़ने की ख्वाहिश जताई है। वह कानूनन अगस्त 2029 तक चुनाव नहीं लड़ सकते। फिर भी उन्होंने यह इच्छा सार्वजनिक कर दी है। लेकिन, उनकी यह इच्छा पूरी हो सकेगी?

योगी सरकार ने बचाया, अमरमणि ने भाजपा को ही ललकारा

उम्रक़ैद की सजा पाए अमर मणि त्रिपाठीऔर उनकी पत्नी को सजा पूरी करने से पहले जेल से बाहर लाने का श्रेय योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को जाता है। सरकार ने सजायाफ्ता कैदियों की समय से पहले रिहाई को लेकर नियमों में जो बदलाव किया, उसका फायदा त्रिपाठी दंपती को मिला। इसके बावजूद अमरमणि ने चुनाव लड़ने का ऐलान करते हुए भाजपा को भी चुनौती दे डाली। वैसे उन्हें यह पता है कि चुनावी राजनीति में भाजपा अब उनकी कोई मदद नहीं करने वाली। भाजपा ही क्या, कोई भी पार्टी शायद ही सजायाफ्ता मुजरिम पर दांव लगाए। वैसे अतीत में अमरमणि भाजपा ही नहीं, सपा, बसपा, कांग्रेस, सभी के साथ रह चुके हैं।

सारे दलों में रहे, पर क्या अब कोई देगा शरण?

अमर मणि ने अपना पहला चुनाव 1981 में सीपीआई के टिकट पर लड़ा था। जब अगला चुनाव भी हार गए, तब कांग्रेस का रुख किया। 1989 में वह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर ही विधायक बने थे। इस बीच उन्होंने अपनी छवि बाहुबली नेता की बना ली थी और इलाके के बड़े ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी से भी करीबी गांठ ली थी। तिवारी भी बाहुबली नेताओं में गिने जाते थे।

विधायक से आगे का अमर मणि का सफर दूसरी पार्टी के साथ शुरू हुआ। 1996 में वह लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर लक्ष्मीपुर से विधायक बने। लोकतांत्रिक कांग्रेस ने बीजेपी से हाथ मिलाया तो अमर मणि को बड़ा फायदा हुआ। कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह की सरकारों में वह मंत्री बनाए गए।

2002 के विधान सभा चुनाव के वक्त अमरमणि बसपा में थे। वह एक बार फिर विधायक और फिर मायावती सरकार में मंत्री भी बने।

एक साल बाद ही अमर मणि के सितारे गर्दिश में जाने लगे। 2003 में जब मधुमिता शुक्ला की हत्या हुई थी तब वह मायावती के नेतृत्व वाली बसपा-भाजपा की गठबंधन सरकार में मंत्री हुआ करते थे। हत्या में नाम आने पर मायावती ने उन्हें बसपा से निकाल दिया और केस सीबीआई को दे दिया। सीबीआई ने अमर मणि, मधुमणि आदि को गिरफ्तार कर लिया।

2007 के चुनाव के वक्त अमर मणि जेल में थे। उन्होंने जेल से ही चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस बार समाजवादी पार्टी का दामन थामा। वह लड़े और जीते भी। लेकिन उसी साल अक्तूबर में जब विशेष सीबीआई अदालत ने मधुमिता हत्याकांड में उम्र कैद की सजा सुनाई तो उनकी विधायकी चली गई। हालांकि, 2008 में उनकी लक्ष्मीपुर विधान सभा सीट ही खत्म हो गई, क्योंकि परिसीमन में यह सीट नौतनवा विधान सभा सीट का हिस्सा बन गई। अमरमणि इस सीट से अपने बेटे अमनमणि को लड़वाना चाहते हैं। अमनमणि पहले भी विधायक रह चुके हैं। वह 2017 में नौतनवा से जीते थे।

अब वह बात नहीं रही और कानून भी है रोड़ा

अमर मणि के साथ उनकी पत्नी मधुमणि को भी सजा हुई थी। दोनों हरिद्वार के रोशनाबाद जेल में रखे गए थे। बाद में दोनों को गोरखपुर जेल भेजा गया। अगस्त 2023 में रिहाई हुई, जिसके बाद राज्य में 2027 में पहला विधान सभा चुनाव होना है। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(3) के मुताबिक किसी अपराध में दो साल या उससे ज्यादा सजा पाए व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है। रिहाई के छह साल बाद तक यह प्रतिबंध कायम रहता है। इस लिहाज से अमरमणि अगस्त 2029 तक चुनाव नहीं लड़ सकते। इसके बावजूद उन्होंने 30 अगस्त को महाराजगंज में एक कार्यक्रम में फरेंदा से 2027 का चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। कई जानकार मानते हैं कि यह ऐलान कर अमरमणि अपनी राजनीतिक औकात परखना चाहते हैं। 20 साल में यमुना से काफी पानी बह चुका है।

करीब 70 साल के अमरमणि एक समय पूर्वाञ्चल के बड़े ब्राह्मण नेता हुआ करते थे। अपने जिले महाराजगंज के साथ गोरखपुर में भी उनका प्रभाव हुआ करता था। इलाके के कद्दावर ठाकुर (राजपूत) नेता वीरेंद्र प्रताप साही से टक्कर लेकर वह और चर्चित हुए। 1981 और 1985 में साही से विधान सभा चुनाव हारने के बावजूद वह इलाके के बड़े ब्राह्मण नेता की हैसियत बनाए रखे। इसके बाद 1989, 1996 और 2002 में वह लक्ष्मीपुर से विधायक बने।

अब न अमरमणि के पास बाहुबल रहा और न ही ब्राह्मणों के मजबूत नेता वाली छवि रही। जिस महाराजगंज के बड़े ब्राह्मण नेता वह माने जाते थे, वहां का राजनीतिक समीकरण भी बदल चुका है। ऐसे में वह आज किसी पार्टी के लिए बहुत ज्यादा काम के नहीं रह गए हैं।

डॉन की कठपुतली हुआ करते थे अमरमणि?

अमरमणि के बारे में कहा जाता है कि वह मंत्री होते हुए भी डॉन की कठपुतली हुआ करते थे। पूर्व आईपीएस ऑफिसर राजेश पांडेय ने अपने संस्मरण में बताया है कि डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला ने एक बार अमरमणि को कुछ पुलिस अफसरों का तबादला करवाने के लिए कहा। जब एक महीना बाद भी तबादला हुआ नहीं तो एक दिन शुक्ला गुस्से में सीधे अमरमणि के कमरे में जा घुसा। उसे देखते ही अमरमणि घबरा गया और कहने लगा, 'अरे, यहां कैसे! मुझे बोला होता, मैं चला आता।' शुक्ला गुस्से में था। उसने तुरंत बैग से एके 47 निकाल लिया और धमकाते हुए बोला- इसे पहचानते हो न। एक मिनट का काम है। गोल घर पर खड़ा होकर चलाऊंगा और 50 लोग मरेंगे तो तुरंत सबका तबादला हो जाएगा।
अमरमणि उसका गुस्सा शांत करने की कोशिश करते रहे, लेकिन वह धमकी देकर गुस्से में ही चला गया।