
बाल झड़ने का दर्द, एक के बाद एक संक्रमण और कमजोर होती सेहत के बीच दोस्तों का साथ बना हौसला; तीन महीने बाद परिवार के साथ बाहर खाना लगा रिकवरी की ओर कदम (फोटो सोर्स : भाषा संवाद WhatsApp News Group)
Masterchef Pankaj Bhadouria: अगस्त का महीना मास्टर शेफ पंकज भदौरिया के लिए दर्द, कमजोरी, डर और उम्मीद-इन सबका मिला-जुला सफर रहा। दूसरी कीमोथेरेपी ने शरीर को तोड़कर रख दिया, संक्रमणों ने मुश्किलें बढ़ाईं और बालों का झड़ना भावनात्मक रूप से झकझोर गया। लेकिन इसी कठिन दौर में परिवार का साथ, दोस्तों की मुस्कान, त्योहारों की खुशियां और तीन महीने बाद अपनों के साथ बाहर जाकर खाना खाने की एक छोटी-सी शाम उनके लिए बड़ी खुशी बन गई।
कैंसर का नाम सुनते ही जिंदगी जैसे अचानक ठहर-सी जाती है। डॉक्टर, अस्पताल, टेस्ट, दवाइयां और कीमोथेरेपी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में छोटी-सी खुशी भी किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं लगती। मास्टरशेफ पंकज भदौरिया की कैंसर जर्नी भी कुछ ऐसी ही भावनाओं से गुजर रही है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अगस्त के महीने की अपनी कैंसर जर्नी साझा की। उनकी पोस्ट में बीमारी से मिलने वाला दर्द भी है और उसके बीच जिंदगी को पकड़कर रखने की कोशिश भी।
अगस्त की शुरुआत दूसरी कीमोथेरेपी के साथ हुई। इस बार इलाज का असर पहले से कहीं ज्यादा महसूस हुआ। शरीर बेहद कमजोर हो गया और संक्रमणों ने परेशानियां बढ़ा दीं।सावधानियां बरतने और डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक दवाएं लेने के बावजूद एक संक्रमण के बाद दूसरा संक्रमण सामने आता रहा। हर गुजरते दिन के साथ कमजोरी बढ़ती गई। सामान्य दिनचर्या भी मुश्किल लगने लगी। कीमोथेरेपी के दौरान शरीर पहले ही बेहद संवेदनशील होता है। ऐसे में संक्रमणों से लड़ना एक अलग चुनौती बन गया। कई दिन ऐसे रहे जब खुद को संभालना और अगले दिन के लिए तैयार करना भी किसी बड़ी लड़ाई जैसा महसूस हुआ।
कैंसर के इलाज में बालों का झड़ना एक आम साइड इफेक्ट माना जाता है, लेकिन जब यही बदलाव खुद के शरीर में दिखाई देने लगे तो उसका दर्द शब्दों से कहीं ज्यादा गहरा होता है। पंकज भदौरिया ने भी इस भावनात्मक दर्द को महसूस किया। बाल सिर्फ शरीर का हिस्सा नहीं होते, वे हमारी पहचान और आत्मविश्वास से भी जुड़े होते हैं। इसलिए उन्हें तेजी से गिरते देखना उनके लिए बेहद मुश्किल अनुभव रहा। बीमारी से लड़ते हुए शरीर में हो रहे बदलावों को स्वीकार करना आसान नहीं था। कीमोथेरेपी जहां शरीर को कमजोर कर रही थी, वहीं बालों का झड़ना मन को भीतर तक छू रहा था।
लेकिन इस मुश्किल सफर में वह अकेली नहीं थीं। अगस्त में दूर और पास रहने वाले कई दोस्त उनसे मिलने पहुंचे। किसी का घर आकर हालचाल पूछना, किसी का कुछ देर पास बैठना या सिर्फ यह कहना कि ‘सब ठीक हो जाएगा’-ये छोटी-छोटी बातें उनके लिए बड़ी ताकत बनती गईं। बीमारी के दौरान दवाओं और इलाज जितना जरूरी होता है, उतना ही जरूरी होता है किसी का साथ। अपनों की मौजूदगी ने मुश्किल दिनों में उन्हें भावनात्मक सहारा दिया और बीमारी के बीच भी सामान्य जिंदगी की थोड़ी-सी झलक वापस लाई।
अगस्त में त्योहार भी आए। बीमारी के बीच इस बार त्योहार शायद पहले जैसे नहीं थे, लेकिन अपनों के साथ छोटी-छोटी खुशियां बांटने का मौका जरूर मिला। इलाज के दौरान खान-पान को लेकर कई सावधानियां रखनी पड़ती हैं। ऐसे में अपनी पसंद की कुछ मिठाई चख लेना भी खास बन गया। वह मिठास सिर्फ मिठाई की नहीं थी, बल्कि उस पल में सामान्य जिंदगी को फिर से महसूस करने की थी।
अगस्त की सबसे भावुक यादों में से एक वह शाम रही, जब करीब तीन महीने बाद पंकज भदौरिया अपने परिवार के साथ घर से बाहर निकलीं। परिवार के साथ बाहर जाकर खाना खाना सुनने में भले ही एक सामान्य बात लगे, लेकिन कैंसर के इलाज से गुजर रहे व्यक्ति के लिए यह बहुत बड़ी खुशी हो सकती है। तीन महीने तक घर और अस्पताल के बीच सिमटी जिंदगी के बाद परिवार के साथ बाहर बैठना उनके लिए किसी छोटी जीत जैसा था। वह शाम सिर्फ बाहर जाकर खाना खाने की शाम नहीं थी। वह इस बात का एहसास थी कि जिंदगी अभी बाकी है और शायद धीरे-धीरे सामान्य होने की तरफ लौट रही है।
कैंसर सिर्फ शरीर को प्रभावित नहीं करता। यह इंसान के सोचने, महसूस करने और जिंदगी को देखने का नजरिया तक बदल देता है। जो चीजें पहले मामूली लगती थीं, वही अब बेहद खास महसूस होने लगी हैं। दोस्तों से मिलना, परिवार के साथ कुछ घंटे बिताना, त्योहार मनाना या अपनी पसंद की कोई चीज खाना-इन छोटे-छोटे पलों की कीमत अब कहीं ज्यादा समझ आती है। पंकज भदौरिया की इस जर्नी में दर्द भी है और उम्मीद भी। कमजोरी भी है और हिम्मत भी। आंसुओं के बीच मुस्कुराने की कोशिश भी है।
इस सफर ने उन्हें यह भी सिखाया कि कैंसर से लड़ाई सिर्फ शरीर की नहीं होती। यह मन और उम्मीद की भी लड़ाई है। कुछ दिन बेहद मुश्किल होते हैं। कुछ दिन शरीर जवाब देता हुआ महसूस होता है। लेकिन फिर किसी दोस्त की मुलाकात, परिवार का प्यार या जिंदगी का कोई छोटा-सा खूबसूरत पल नई ताकत दे जाता है। अगस्त में भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक तरफ दूसरी कीमोथेरेपी, संक्रमण, कमजोरी और बालों के झड़ने का दर्द था, तो दूसरी तरफ दोस्तों का साथ, त्योहारों की रौनक और परिवार के साथ बिताई वह यादगार शाम।
पंकज भदौरिया की कैंसर जर्नी की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि बीमारी जिंदगी का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन पूरी जिंदगी नहीं। कैंसर ने उनकी जिंदगी की रफ्तार जरूर बदली है, प्राथमिकताएं बदल दी हैं और छोटे-छोटे पलों की अहमियत समझाई है, लेकिन जीने की चाह को खत्म नहीं किया। तीन महीने बाद परिवार के साथ बाहर जाकर खाना खाने की वह शाम इस सफर में एक छोटी-सी जीत बन गई। क्योंकि रिकवरी हमेशा किसी बड़े बदलाव के साथ नहीं आती। कभी वह किसी दोस्त की मुस्कान में नजर आती है, कभी त्योहार की मिठास में, कभी परिवार के साथ बिताए कुछ घंटों में और कभी इस भरोसे में कि आने वाला दिन आज से बेहतर होगा। दर्द अभी भी है, इलाज अभी जारी है और सफर लंबा है। लेकिन उम्मीद भी साथ है। कैंसर ने जिंदगी बदल दी है, लेकिन जिंदगी को खत्म नहीं किया। अब कोशिश यही है कि हर दिन को प्यार, अपनों के साथ और उम्मीद के साथ जिया जाए।
Updated on:
01 Sept 2026 04:18 pm
Published on:
01 Sept 2026 04:18 pm
