1 सितंबर 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

‘अखिलेश यादव के मंच पर छाईं 18 साल की प्रतीक्षा यादव!’ जानिए कौन हैं महोबा की ये युवा लोक गायिका

Prateeksha Yadav: प्रतीक्षा यादव महोबा जिले के बगवाहा गांव की रहने वाली हैं। वे आल्हा गायन की युवा कलाकार हैं। उनकी छोटी बहन दीक्षा यादव भी उनके साथ मंच साझा करती हैं।
2 min read
Google source verification
Prateeksha Yadav

आल्हा गायन प्रतीक्षा यादव- फाइल फोटो

Prateeksha Yadav Mahoba Folk Singer: लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के मंच पर जब एक युवती की आवाज गूंजी तो पूरा माहौल बदल गया। राजनीति की चर्चा एक पल के लिए थम गई और लोग बुंदेलखंड की लोक धुनों में खो गए। यह आवाज थी महोबा की 18 वर्षीय लोक गायिका प्रतीक्षा यादव की। उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों को इतना प्रभावित किया कि तालियों की गड़गड़ाहट लंबे समय तक गूंजती रही। यह कोई बड़े शहर के स्टूडियो से निकली आवाज नहीं थी, बल्कि बुंदेलखंड की मिट्टी से उपजी सच्ची लोक कला थी।

कौन हैं प्रतीक्षा यादव और उनकी बहन

प्रतीक्षा यादव महोबा जिले के बगवाहा गांव की रहने वाली हैं। वे आल्हा गायन की युवा कलाकार हैं। उनकी छोटी बहन दीक्षा यादव भी उनके साथ मंच साझा करती हैं। दोनों बहनें बचपन से ही आल्हा की वीर गाथाएं गाती आ रही हैं। आल्हा बुंदेलखंड की वो लोक परंपरा है जिसमें आल्हा-ऊदल जैसे वीर योद्धाओं की शौर्य कथाएं गायी जाती हैं। प्रतीक्षा और दीक्षा इस विरासत को अपनी आवाज में जीवित रखे हुए हैं और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं।

पिता की प्रेरणा और कठिन संघर्ष

प्रतीक्षा ने मीडिया से बातचीत में बताया कि आल्हा गायन का सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने कहा, 'बहुत छोटे से मेहनत की है। पहले अध्ययन किया, उसके बारे में जाना और फिर मंच पाया। हमारे पिताजी ने बहुत मेहनत कराई है।' दोनों बहनों को आल्हा गायन की शिक्षा उनके पिता से मिली। पिता ही उनके आदर्श और मार्गदर्शक हैं। गांव की सीमित सुविधाओं के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा। आज वह मेहनत रंग ला रही है और प्रतीक्षा की चर्चा लखनऊ तक पहुंच गई है।

अखिलेश यादव से मुलाकात का अनुभव

अखिलेश यादव से मिलने का मौका मिलने पर प्रतीक्षा के मन में उत्साह और हल्की घबराहट दोनों थे। उन्होंने बताया कि लखनऊ पहुंचकर राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात होने और उन्हें सामने से देखने की आंतरिक खुशी थी। उत्साह ज्यादा था, घबराहट भी थी, लेकिन उत्साह भारी पड़ा। मंच पर उनकी प्रस्तुति के बाद दर्शक राजनीति भूलकर लोकगीत सुनने लगे। यह पल उनके कलात्मक सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया।

बुंदेलखंड की संस्कृति को नई पहचान

प्रतीक्षा और दीक्षा का लक्ष्य सिर्फ पुरस्कार जीतना नहीं है। वे बुंदेलखंड की लोक संस्कृति को देश और दुनिया में पहचान दिलाना चाहती हैं। दोनों बहनों ने कई स्थानीय प्रतियोगिताओं में पुरस्कार हासिल किए हैं और पूरे क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है। लखनऊ के मंच पर सफलता के बाद उनकी चर्चा अब पूरे उत्तर प्रदेश में फैल रही है। वे साबित कर रही हैं कि गांव की मिट्टी से निकली प्रतिभा बड़े मंचों पर भी चमक सकती है।

युवा आवाज का भविष्य

आज प्रतीक्षा यादव महोबा की पहचान बन चुकी हैं। 18 साल की उम्र में उन्होंने जो संघर्ष और समर्पण दिखाया है, वह कई युवाओं के लिए प्रेरणा है। आल्हा गायन जैसी पारंपरिक कला को जीवित रखने का उनका प्रयास सराहनीय है। अखिलेश यादव के मंच से मिली सफलता उनके सफर का सिर्फ एक अध्याय है। आगे भी वे बुंदेलखंड की वीर गाथाओं को अपनी आवाज में गूंजाती रहेंगी और लोक संस्कृति को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगी।