
पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री, PC- Patrika
First Chief Minister of Uttar Pradesh : पहाड़ की सीधी-साधी जिंदगी से… यूपी की धुर राजनीति में बनाई अपनी पहचान। अल्मोड़ा में जन्मे थे लेकिन महाराष्ट्रियन मूल के थे। पिता सरकारी नौकरी में थे इसलिए तबादला होता रहा। नाना के पास ही रहकर पढ़ाई की। मां के गोविंदी बाई के नाम पर मिला था नाम गोविंद वल्लभ पंत… जो उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने थे। गोविंद वल्लभ पंत ऐसे मुख्यमंत्री थे जिन्होंने एक मीटिंग में नाश्ते के वाउचर पर साइन करने से मना कर दिया था। उनका कहना था मीटिंग में सरकारी खजाने से सिर्फ चाय की अनुमति है नाश्ते की नहीं। इसलिए मैं यह बिल पास नहीं कर सकता है। देश के सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाल सकता।
एक किस्सा और भी है। गोविंद वल्लभ पंत पेशे से वकील थे, लेकिन उनकी यह खासियत थी कि वह सच्चे केस ही लेते थे। अगर क्लाइंट के झूठ का उन्हें पता चल जाता तो वह बीच में ही केस छोड़ दिया करते। गोविंद वल्लभ पंत, पंडित जवाहर लाल नेहरू के बहुत खास थे।
पंडित गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को हुआ था। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे पंत कुशल वकील, स्वतंत्रता सेनानी, दूरदर्शी प्रशासक और राजनेता थे। वे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के निकट सहयोगी रहे। स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में राष्ट्र की एकता-अखंडता को मजबूत किया। 1957 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
पंत को बचपन में उनके घरवाले थपुआ कहते थे। वह अपने दोस्तों के साथ खेलने जाते लेकिन वह खेलते नहीं बैठे रहते और देखते रहे। 14 साल की उम्र में उन्हें पहला हार्ट अटैक आया।
साइमन कमीशन का विरोध करते हुए वह बुरी तरह से घायल हो गए। उनको इतनी गंभीर चोटें आईं कि उनकी गर्दन कभी सीधी नहीं हो पाई। नेहरू ने लिखा- 'पंत मेरे सामने थे, उनकी लंबाई ने उन्हें बड़ा निशाना बना दिया।'
पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) के मुख्यमंत्री के रूप में तीन कार्यकाल पूरे किए। उनका पहला कार्यकाल 17 जुलाई 1937 से 2 नवंबर 1939 तक रहा, जो 839 दिनों का था। दूसरा कार्यकाल 1 अप्रैल 1946 से 25 जनवरी 1950 तक चला, जिसमें 1396 दिन शामिल थे। तीसरा कार्यकाल 26 जनवरी 1950 से 27 दिसंबर 1954 तक रहा, जब संयुक्त प्रांत का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश हो गया और वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। यह कार्यकाल 1797 दिनों का था। कुल मिलाकर उन्होंने लगभग 4032 दिन (11 वर्ष से अधिक) मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की और स्वास्थ्य कारणों से 1954 में इस्तीफा दे दिया। कहा जाता है कि उनके कार्यकाल में एक भी दंगा नहीं हुआ।
इन कार्यकालों में पंत की प्रमुख उपलब्धियां बेहद महत्वपूर्ण रहीं। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई तथा कई बार जेल गए, जिसमें 1942 से 1945 तक जवाहरलाल नेहरू के साथ अहमदनगर किले में बंदी रहना शामिल है। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू कर किसानों को भूमि अधिकार प्रदान किए, जिससे उत्तर प्रदेश में कृषि क्रांति आई। पंचायती राज प्रणाली को मजबूत किया, सहकारी खेती को प्रोत्साहित किया और ग्रामीण विकास पर विशेष जोर दिया।
केंद्रीय गृह मंत्री (1955-1961) रहते हुए भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन (1956 एक्ट) का नेतृत्व किया तथा हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने में अहम योगदान दिया, जिससे भारत की एकता-अखंडता और मजबूत हुई। इसके अलावा काकोरी कांड में क्रांतिकारियों की पैरवी की और हिंदी प्रचार तथा उत्तराखंड के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पंत सादगी और ईमानदारी के जीते-जागते प्रतीक थे, जिनके कई रोचक किस्से आज भी प्रेरणा देते हैं। मुख्यमंत्री रहते एक सरकारी बैठक में चाय के साथ नाश्ता मंगवाया गया तो उन्होंने नाश्ते का बिल सरकारी खजाने से पास करने से इनकार कर दिया, क्योंकि नियम केवल चाय का था। अपनी जेब से पैसे निकालकर बोले- 'चाय सरकारी खजाने से, नाश्ता मुझसे!'
व्यस्त राजनीतिक जीवन के बावजूद वे रसोई के शौकीन थे और परिवार-मित्रों के लिए खुद स्वादिष्ट व्यंजन बनाते थे। हास्यप्रिय और प्रकृति प्रेमी पंत विपक्ष को तर्क से हराते थे, लेकिन कभी अपमानित नहीं करते। बागवानी और साहित्य से गहरा लगाव रखते थे तथा अपना जन्मदिन अनंत चतुर्दशी पर मनाते थे, क्योंकि इसका सनातन संस्कृति से गहरा संबंध था।
Updated on:
06 Jan 2026 04:54 pm
Published on:
06 Jan 2026 04:51 pm
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