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गोपाल दास नीरज बर्थडे: प्रेम का कवि, जिसने कभी बीहड़ में हथियार चलाना सीखा था

गोपालदास नीरज शायद देश नहीं दुनिया के अकेले शायर और कवि होंगे, जो करीब 8 दशक तक मुशायरों में छाए रहे।

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लखनऊ

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Rizwan Pundeer

Jan 04, 2023

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अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई

मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई।


हर गलत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझको

एक आवाज तेरी जब से मेरे साथ हुई।


ये दोहा भी पढ़िए


मौसम कैसा भी रहे कैसी चले बयार

बड़ा कठिन है भूलना पहला-पहला प्यार।


कौन मानेगा कि पहले प्यार को ना भूला पाने वाला, सावन की शरारत को गाना वाला कवि बीहड़ में हथियार चलाना भी सीखा था। कौन मानेगा कि इस शख्स की ना अंग्रेजी सरकार से बनी ना आजाद भारत की सरकार से, दोनों की नौकरियां इसने छोड़ दी। कौन यकीन करेगा कि जिसने बचपन में सब्जी बेचकर पेट पाला हो वो मुंबई को अपने करियर के पीक पर लात मारकर चला आया। लेकिन गोपालदास नीरज ऐसे ही थे, प्यार के गीत गाने वाले फक्कड़, यायावर, यारों के यार, जो अपनी मर्जी से जिया। उनकी जिंदगी अपने आप में एक किताब है। जिसके हर वरक पर बहुत कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाला नीरज का हो जाता है और नीरज उसके। आज नीरज की जयंती के मौके पर उनकी जिंदगी के कुछ वरके उलटते हैं, उनको याद करते हैं।


गोपालदास सक्सेना, जी यही उनका बचपन का नाम था, जिनको आज हम सब नीरज के नाम से जानते हैं। गोपालदास सक्सेना की आज जयंती है। आज ही की तारीख यानी 4 जनवरी को इटावा के पुरुलिया गांव में जन्मे थे। नीरज का बचपन बहुत खूबसूरत नहीं बीता था। वो ऐसा दौर था, जिसे शायद वो भूलना ही चाहते होंगे। 5-6 साल की उम्र में पिता का साया उठ गया। मुखिया के चले जाने से पूरा घर जैसे टूट गया। जिस बच्चे की उम्र दहाई में नहीं पहुंची थी, उस पर घर के खर्च में हाथ बंटाने की जिम्मेदारी आ गई।

जीवन की शुरुआत, तांगा चलाया, सब्जियां बेची

गोपालदास नीरज स्कूल में पढ़ने जाते और आकर कभी सब्जियां बेचते तो कभी मेहनत मजदूरी करते। गोपालदास नीरज ने राज्यसभा को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, मैंने तांगा चलाने से लेकर रेल में बीड़ी की दुकान लगाने तक सब किया, मैंने कभी किसी काम को ना छोटा समझा, ना मुंह मोड़ा।


गोपालदास नीरज ने दसवीं पास की तो अंग्रेजी सरकार में खाद्य विभाग में 67 रुपए महीना पर टाइपिस्ट की नौकरी मिल गई। नौकरी शुरू की लेकिन मन से तो नीरज एक कवि ही थे। स्कूल के जमाने से ही कविताओं का शौक रखने वाले गोपालदास ने 'भावुक इटावी' के नाम से कविताएं लिखना शुरू कर दिया।


'भावुक इटावी'के नाम से 1941 में पहली बार एटा में हुए कवि सम्मेलन में कविताएं सुनाईं और 1942 में दिल्ली के पहाड़गंज में पहला मुशायरा पढ़ा। इसके बाद तो ये सफर ऐसा चला कि नीरज प्रेमकवि के तौर पर छा गए। उनको देखने और सुनने के लिए मुशायरों, कवि सम्मेलनों में भीड़ उमड़ने लगी। नीरज माइक पर आते तो भीड़ उनको माइक छोड़ने का देती। आखिर क्यों ना उनको लोग रात-रातभर सुनते, उनकी कविताएं हैं ही ऐसी कि किसी को भी अपने साथ ऐसे बांध ले कि उसी की बात हो रही है। प्रेमकवि नीरज लिखते हैं-


जब चले जाएंगे हम लौट के सावन की तरह

याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह


जिक्र जिस दम भी छिड़ा उन की गली में मेरा

जाने शरमाए क्यों गए वो गांव की दुल्हन की तरह।


भावुक इटावी, बीहड़ पहुंच गया

1942 के बाद का ये दौर था जब गोपालदास यानी भावुक इटावी अपनी कविताओं से धूम मचा रहे थे तो दूसरी और उनकी नौकरी से गुजरबसर भी हो रही थी। यही वो वक्त था जब देश में भारत छोड़ो आंदोलन भी चल रहा था। बच्चा-बच्चा गांधी-नेहरू के आह्वान पर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहा था तो उस वक्त 19-20 साल के नौजवान गोपालदास कैसे इससे अछूते रह सकते थे।


2012 में गोपालदास नीरज पर राज्यसभा के लिए किए अपने शो में वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल बताते हैं, भारत छोड़ो आंदोलन उरूज पर पहुंचा तो गोपालदास ने नौकरी छोड़ी, कविता को किनारे किया और पहुंच गए यमुना के बीहड़ों में। यहां उन्होंने अंग्रेजों से लड़ने के लिए हथियार चलाना सीखा। आंदोलन में शामिल होने के लिए जेल भेज दिए गए। अंग्रेज अफसर ने माफी मांग लेने पर छोड़ देने का वादा किया लेकिन गोपालदास ने जेल चुनी। जेल से छूटे तो कानपुर आ गए और एक निजी कंपनी में नौकरी करने लगे।


आजादी के बाद भी नहीं चली नीरज की नौकरी
गोपालदास नीरज कानपुर में ही थे कि देश आजाद हो गया। आजादी के बाद फिर सरकारी नौकरी मिली लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर सीनियर अफसर से भिड़ गए और 1956 में ये नौकरी भी चली गई। आजादी के बाद भी वो व्यवस्था पर लगातार कटाक्ष करते रहे।


दुखते हुए जख्मों पे हवा कौन करे

इस हाल में जीने की दुआ कौन करे।

बीमार हैं जब हैं खुद ही हकी माने वतन

फिर तेरे मरीजों की दवा कौन करे।।


नीरज एक और व्यवस्था पर तंज कर रहे थे तो दूसरी ओर पंडित नेहरू और महात्मा गांधी के प्रशंसक भी थे। देश के पहले पीएम पंडित नेहरू को याद करते हुए उन्होंने लिखा-


पूरब-पश्चिम बेच रहे थे बारूद जब बाजारों में
पंचशील का मरहम लेकर पहुंचा वो बीमारों में
फिर उड़ाया शान्ति का एक कबूतर उसने ऐसा
दंग रह गए जंगखोर सब, जंग लगा हथियारों में
चलता फिरता जादू था, एक 75 साल का
वही जवाहर जो खुद में था, मेला एक मशाल का।

फिल्मों में एंट्री और कर दिया कमाल

गोपालदास सक्सेना अब नीरज के नाम से लिख रहे थे। 1954 में उन्हों ने एक गीत लिखा। गीत रेडियो पर सुनाया। गीत इतना मशहूर हुआ कि लोगों की जुबान पर चढ़ गया। इसके बाद तो वो 1954 था और आज 2023, ये गीत नीरज की पहचान बन गया। शायद ही उनके जीते जी कोई ऐसा कार्यक्रम रहा हो, जिसमें उनसे ये गीत ना सुना गया हो। गीत था- कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे...


स्वप्न झरे फूल से,

मीत चुभे शूल से,

लुट गये सिंगार सभी बाग़़ के बबूल से,

और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।

कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे!

हाथ थे मिले कि जुल्फ चांद की संवार दूं,

होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं,

दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं,

और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,

हो सका न कुछ मगर,

शाम बन गई सहर,

वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखरबिखर,

और हम डरेडरे,

नीर नयन में भरे,

ओढ़कर कफन, पड़े मजार देखते रहे।

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!


मांग भर चली कि एक जब नई नई किरन,

ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरनचरन,

शोर मच गया कि लो चली चली दुल्हन,

गांव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयननयन,

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पर तभी ज़हर भरी,

गाज एक वह गिरी,

पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,

और हम अजान से,

दूर के मकान से,

पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

इसी दौर में नीरज की मायानगरी मुंबई और फिल्मों में भी एंट्री होती है। दरअसल डायरेक्टर आर चंद्रा को कारवां गुजर गया, ऐसा भाया कि 1960 में उन्होंने इससे प्रभावित होकर ‘नई उमर की नई फसल’ नाम से फिल्म ही बना डाली। जिसमें सारे गीत नीरज के थे। जिनमें कारवां गुजर गया के अलावा 'देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम, प्यार का ये मुहूर्त निकल जाएगा', 'आज की रात बड़ी शोख बड़ी नाजुक है,आज की रात हमें नींद नहीं आएगी' भी खूब मशहूर हुए।


कथक डांसर उमा शर्मा ने इस गीत को लेकर एक इंटरव्यू में बताया था कि नीरज की रिश्तेदारी में एक लड़की शादी के दौरान मर गई थी। फेरे लेते हुए उसके कपड़ों में आग लगी और उसको बचाया ना जा सका। इसी हादसे के बाद नीरज ने ये गीत लिखा था।

देवानंद से नीरज की दोस्ती

60 का दशक फिल्मों में नीरज का दशक था। एक के बाद एक हिट गाने वो दे रहे थे। 1968 में आई फिल्म कन्यादान में शशि कपूर और आशा पारेख पर फिल्माया गीत 'लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हजारों रंग के नजारे बन गए' ने तो कायमाबी के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे।


गोपालदास नीरज ने यूं तो राज कपूर से लेकर मनोजकुमार तक तमाम बड़े सितारों के साथ काम किया लेकिन उनको फिल्म इंडस्ट्री में जो सबसे अच्छा दोस्त मिला, वो थे देव आनंद। देव आनंद के साथ फिल्मों में भी वो हिट रहे और दोस्ती में भी। देव आनंद की फिल्म प्रेम पुजारीके लिए गोपालदास नीरज के गानों ने तो धूम मचा दी थी। गानों में एसडी बर्मन का संगीत और नीरज के गीत, पर्दे पर इठलाते देव आनंद और वहीदा रहमान।


रंगीला रे तेरे रंग में यूं रंगा है मेरा मन

छलिया रे ना बुझे है किसी जल से ये जलन

ओ रंगीला रे...


शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब

उसमे फिर मिलायी जाए थोड़ी सी शराब
होगा यूं नशा जो तैयार.
वो प्यार हैं...


आज महदोश हुआ जाया रे

मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन

बिना ही बात मुस्कुराए रे
मेरा मन, मेरा मन मेरा मन

प्रेम पुजारी के ये गाने आज भी हमको एक अलग दुनिया में ले जाकर झूमने पर मजबूर कर देते हैं। इन गानों को सुनकर ये समझा जा सकता है कि कामयाबी की किस चोटी पर उस वक्त नीरज हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में थे। लेकिन नीरज ठहरे फक्कड़ नीरज, मायानगरी को छोड़ अलीगढ़ आ गए वो भी राजकपूर को खूब सुना के।

राजकपूर से बोले- आप की तरह मैं भी हीरो हूं

तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड जीतने वाले नीरज शानदार चलते करियर के बीच 1973 में मुंबई को अलविदा कहकर अलीगढ़ आ गए। राजकपूर के लिए 'मेरा नाम जोकर'में 'ऐ भाई जरा देख के चलो' जैसा हिट गाना लिखने वाले में नीरज मुंबई छोड़ने से पहले उनको काफी कुछ सुना आए थे। दरअसल राजकपूर से कुछ अनबन हुई तो नीरज ने उनसे कह दिया कि मैं तो अलीगढ़ चला जाऊंगा।


राज्यसभा को दिए इंटरव्यू में नीरज कहते हैं, "राजकपूर मुझसे बोले, आप कहते रहो नीरज लेकिन ये मुमकिन ही नहीं है कि जो आदमी मुंबई शहर में कामयाबी देख ले वो वापस चला जाए। मैंने उनसे कहा- आप मुझे समझे नहीं, मैं वो आदमी नहीं हूं। जैसे आप यहां के हीरो हैं, वैसे ही मैं भी अपने इलाके का हीरो हूं, मैं जा सकता हूं"


जितना कम सामान रहेगा

उतना सफर आसान रहेगा


जितनी भारी गठरी होगी

उतना तू हैरान रहेगा।।


लिखने वाले नीरज ने मुंबई से अपनी गठरी उठाई और आ गए वापस अलीगढ़। दरअसल नीरज ने मुंबई में ज्यादातर काम रोशन, शंकर जयकिशन, एसडी बर्मन, इकबाल कुरैशी, जयदेव, हेमंत कुमार, देव आनंद, मनोज कुमार जैसे नामी लोगों के साथ किया था।

रोशन, शंकर-जयकिशन जोड़ी के जयकिशन और एसडी बर्मन का निधन के बाद नए लोगों के साथ उनका ज्यादा पट नहीं सकी। कोई उनके गानों में मीन-मेख निकाले ये नीरज को पसंद नहीं था, ना ही वो धुन के लिए गाने में बदसलाव करना पसंद करते थे। बस यही उनको वापस अलीगढ़ ले आया। उन्होंने लिखा भी-


अब न वो दर्द, न वो दिल, न वो दीवाने हैं

अब न वो साज, न वो सोज, न वो गाने हैं

साकी! अब भी यहां तू किसके लिए बैठा है

अब न वो जाम, न वो मय, न वो पैमाने हैं।



लखनऊ में लड़कियों ने नीरज को हॉस्टल ले जाकर रातभर सुनी थीं कविताएं

नीरज महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय थे राज्यसभा टीवी के एक कार्यक्रम में पत्रकार राजेश बादल बताते हैं, नीरज का कुछ वक्त लखनऊ में भी बीता। लखनऊ यूनिवर्सिटी के गर्ल्स हॉस्टल में लड़के घुस नहीं सकते थे लेकिन नीरज को लड़कियां चुपचाप ले जातीं, दरवाजा बंद हो जाता और फिर रातभर गीतों की महफिल सजी रहती।

मजहबी उन्माद से हमेशा रहे परेशान

नीरज के प्रेमगीतों और आजादी की लड़ाई के समय उनके इंकलाबी तेवरों की बात तो हम कर ही चुके हैं। एक और पहलू है जिसे छूना जरूरी है। वो है मजहबी उन्माद के बारे में नीरज की सोच। अपने कविता संग्रह 'कारवां गीतों का' की भूमिका में नीरज लिखते हैं, कविता का काम इंसान को इंसान के करीब लाना है। कहीं मेरी कविता भटक न जाए, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। वो कहते हैं कि मेरा विश्वास धर्म में नहीं धार्मिकता में है। वो अपनी कविता में नीरज कहते हैं-

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।


जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर

फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए।


जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे

मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।


गीत अनमन है गजल चुप है रुबाई है उदास

ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाए।

पाकिस्तान को लिखा था मुहब्बत का संदेश
1947 का बंटवारा अपनी आंखों से देखने वाले नीरज अपनी कविता या शायरी में इस घटना से आक्रामत नहीं होते हैं। बल्कि वो इससे सीखते हुए प्यार से रहने की बात करते हैं। पाकिस्तान के लिए बंटवारे के बाद उन्होंने लिखा-


दो हुए तो क्या मगर हम एक ही घर के सहन हैं
एक ही लौ के दिए हैं, एक ही दिन की किरण हैं।

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नीरज को अलीगढ़ ही भाया
नीरज इटावा में पैदा हुए, दिल्ली में नौकरी की, कानपुर में रहे। मुंबई और कई शहरों में रहे लेकिन जिस शहर को उन्होंने घर माना वो था अलीगढ़। कानपुर से नौकरी छोड़कर लौटना हो या मुंबई से वापसी, वो अलीगढ़ ही आए। अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में कई सालों तक हिन्‍दी साहित्य के प्रोफेसर रहे। फिर रिटायरमेंट के बाद भी अपनी आखिरी सांसों तक अलीगढ़ में ही रहते रहे।

सदियों गाये जाने वाले गीत देकर दूसरी दुनिया में गुनगुना चले गए नीरज
1942 से कविता पढ़ना शुरू करने वाले नीरज शायद अकेले ऐसे कवि, शायर होंगे जो करीब 75 सालों तक मचों पर छाए रहे। नीरज वो कवि और गीतकार हैं, जिन्होंने जिगर मुरादाबादी, महादेवी वर्मा, हफीज जलंधरी, अटल बिहारी वाजपेयी और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से लेकर कुमार विश्वास तक के साथ मंच साझा किया। नीरज शायद अकेले हिन्दी के कवि होंगे, जिनको सुनने के लिए लंदन में टिकट लेना पड़ता था।


मित्रो हर पल को जियो अंतिम पल ही मान
अंतिम पल है कौन सा कौन सका है जान

अपनी मर्जी, अपने तरीके से 93 साल की भरपूर जिंदगी जीने वाले और आखिरी सांस तक मुशायरों में लोगों को झूमने पर मजबूर करने वाले नीरज 19 जुलाई 2018 को इस दुनिया को अलविदा कर किसी दूसरी दुनिया में अपने गीत सुनाने चले गए।

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संघर्ष, दर्द दिया है, नीरज की पाती, कारवां गुजर गया, फिर दीप जलेगा जैसे कविता संग्रह लिखने वाले नीरज को 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्म भूषण से सम्‍मानित किया गया। आज नीरज की देह भले हमारे बीच नहीं लेकिन अपने प्रेमगीतों के जरिए वो सदियों तक जिंदा रहेंगे। वो खुद कह गए हैं।


इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में
तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में।


आज भी होती है दुनिया पागल
जाने क्या बात है नीरज के गुनगुनाने में।