2 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

UP हाईकोर्ट ने बेघर-बेसहारा लोगों के पुनर्वास पर सरकार से मांगा जवाब, अगली सुनवाई 24 नवंबर को

UP High Court Questions State Government: उत्तर प्रदेश में बेघर और बेसहारा लोगों की दयनीय हालत को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार से सख्त सवाल किए हैं। कोर्ट ने पूछा है कि ऐसे लोगों के पुनर्वास, इलाज और संरक्षण के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। अगली सुनवाई 24 नवंबर को होगी।

4 min read
Google source verification

लखनऊ

image

Ritesh Singh

Nov 18, 2025

अगली सुनवाई 24 नवंबर को, महिला कल्याण विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारी रहेंगे उपस्थित (फोटो सोर्स : Whatsapp News Group )

अगली सुनवाई 24 नवंबर को, महिला कल्याण विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारी रहेंगे उपस्थित (फोटो सोर्स : Whatsapp News Group )

UP High Court: उत्तर प्रदेश में बेसहारा, बेघर और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों की स्थिति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि प्रदेश के ऐसे लोगों के पुनर्वास के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस प्रयास किए गए हैं और भविष्य में क्या कदम उठाए जाने प्रस्तावित हैं। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 24 नवंबर की तारीख तय की है।

ज्योति राजपूत द्वारा दायर की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने राज्य सरकार के रुख पर असंतोष जताया और विस्तृत जानकारी मांगी। याचिका में मंदिरों, अस्पतालों, फुटपाथों, सार्वजनिक स्थलों और शहर के अन्य इलाकों में रहने वाले बेसहारा लोगों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और रहने की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

कोर्ट का सख्त रुख: “97 बेसहारा लोग मिले-सरकार बताये, इनके लिए क्या किया

अदालत ने यह भी पूछा कि हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित समिति ने जो रिपोर्ट पेश की है, उसके आधार पर सरकार ने कौन-से कदम उठाए हैं। समिति की रिपोर्ट में राजधानी लखनऊ में ऐसे 97 बेसहारा और बेघर लोगों की पहचान की गई है, जो बिना उचित इलाज, भोजन और shelter के सड़क किनारों या सार्वजनिक स्थलों पर रह रहे हैं।

कोर्ट ने सरकारी वकील से स्पष्ट जवाब मांगा कि इन 97 लोगों के पुनर्वास, इलाज और संरक्षण के लिए सरकार की ओर से क्या कार्रवाई की गई है। क्या इन लोगों को आश्रय गृह भेजा गया? क्या उनका चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया? क्या उन्हें भोजन, कपड़ा व अन्य सुविधाएँ मुहैया कराई गईं? अदालत ने कहा कि केवल रिपोर्ट जमा करने या औपचारिकताएं पूरी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बेसहारा लोगों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराया जाए।

याचिका में उठाए गए मुद्दे: इलाज, आश्रय और आपातकालीन सेवाओं में उपेक्षा

ज्योति राजपूत द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि बड़ी संख्या में लोग मंदिरों, पुलों, अस्पतालों के बाहर, खाली भूखंडों और फुटपाथों पर बिना किसी मदद के रह रहे हैं। इनमें कई लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ, बीमार, वृद्ध या विकलांग हैं। याचिका में विशेष रूप से यह भी कहा गया है कि इमरजेंसी में लाए गए बेसहारा व्यक्तियों को अक्सर उचित इलाज नहीं मिलता,उपचार के दौरान उनकी पहचान या परिजन न मिलने पर उन्हें छोड़ दिया जाता है, आश्रय गृहों में सुविधाओं की कमी के कारण कई लोग वापस सड़क पर लौटा दिए जाते हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया था कि सरकार को निर्देश दिए जाएँ कि वह ऐसे लोगों के लिए स्थायी और व्यावहारिक पुनर्वास नीति बनाए।

समिति का गठन और उसकी रिपोर्ट

हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष समिति का गठन किया था, जिसमें जिले के प्रशासनिक और महिला कल्याण विभाग के अधिकारी शामिल थे। इस समिति को राजधानी में घूमकर बेसहारा व्यक्तियों की वास्तविक स्थिति का पता लगाने का निर्देश दिया गया था। समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि लखनऊ शहर में 97 ऐसे लोग मिले, जो पूरी तरह सड़क पर रहने को विवश हैं। इनमें से कई मानसिक रूप से अस्वस्थ या गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। कई वृद्ध महिलाए और पुरुष बिना किसी सहारे के फुटपाथों पर रह रहे हैं। कुछ व्यक्तियों को अस्पतालों के बाहर देखा गया, जो उपचार के अभाव में बैठे या सोते मिले।

यह रिपोर्ट अदालत में पेश होने के बाद खंडपीठ ने सरकार से स्पष्ट कहा कि सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत इन लोगों का संरक्षण राज्य का दायित्व है, और इस दिशा में किए गए कदमों की विस्तार से जानकारी अदालत को दी जानी चाहिए।

वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति और कोर्ट की गंभीरता

13 नवंबर को हुई पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने महिला कल्याण विभाग की विशेष सचिव सुधा वर्मा और महिला कल्याण निदेशक संदीप कौर को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए थे। दोनों अधिकारी तय तारीख पर उपस्थित हुए और कोर्ट ने उनसे राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत उपस्थिति इसलिए अनिवार्य की गई है, ताकि वे प्रत्यक्ष रूप से स्थिति और चुनौतियों को समझें तथा प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित कर सकें।

इसके साथ ही कोर्ट ने 24 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में दोनों अधिकारियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दे दी है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया है कि वे सरकार की ओर से प्रस्तुत की जाने वाली प्रगति रिपोर्ट पर संतोषजनक जवाब तैयार रखें।

कोर्ट का निर्देश: बेघर और बेसहारा लोग केवल सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं

अदालत ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि बेसहारा लोग केवल संख्या या रिपोर्ट का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे जीवित मनुष्य हैं जिन्हें शासन की ओर से तत्काल संरक्षण और संवेदनशीलता की आवश्यकता है। कोर्ट ने कहा कि राज्य का दायित्व केवल योजनाएं चलाने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि समाज के सबसे कमजोर और हाशिए पर मौजूद लोग भी सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें। अदालत ने यह भी कहा कि सड़कों पर रहने वाले मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिए विशेष मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएँ। ऐसे लोगों के इलाज और काउंसिलिंग के लिए मनोचिकित्सक, समाजसेवी और चिकित्सकीय टीमों का गठन किया जाना चाहिए।

सरकार से अपेक्षित जवाब

अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई में सरकार को निम्न बिंदुओं पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी-

  • 97 बेसहारा लोगों के पुनर्वास के लिए अब तक उठाए गए विशिष्ट कदम।
  • उन्हें किस आश्रय गृह में रखा गया, कितने लोगों का इलाज हुआ।
  • मानसिक रूप से अस्वस्थ पाए गए व्यक्तियों का कैसे उपचार किया गया।
  • भविष्य में ऐसे लोगों की पहचान और पुनर्वास के लिए क्या स्थायी नीति प्रस्तावित है।नगर निगम, महिला कल्याण विभाग, स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक कल्याण विभाग के बीच समन्वय तंत्र कैसे काम करेगा।