
सपा प्रमुख अखिलेश यादव, मायवती और असदुद्दीन ओवैसी (IANS Photo)
Meerut South Election: मेरठ दक्षिण विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव से पहले सियासी समीकरण एक बार फिर चर्चा में हैं। इस सीट पर मुस्लिम और दलित वोटरों की संख्या ज्यादा होने के बावजूद पिछले तीन चुनाव से बीजेपी के गुर्जर उम्मीदवार जीतते आ रहे हैं। साल 2012 में रवींद्र सिंह भड़ाना, 2017 और 2022 में सोमेंद्र सिंह तोमर ने बीजेपी के टिकट पर जीत दर्ज की। अब सवाल है कि आखिर विपक्षी वोटों के बीच बीजेपी का गुर्जर चेहरा लगातार कैसे बाजी मार रहा है, क्या इसके पीछे वोटों का बंटवारा सबसे बड़ा कारण है और साल 2027 में यह समीकरण फिर काम करेगा?
मेरठ दक्षिण सीट पर मुस्लिम और दलित वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन यहां लगातार तीन चुनाव से गुर्जर समुदाय का उम्मीदवार जीत रहा है। बीजेपी की जीत में विपक्षी वोटों के बंटवारे की भूमिका भी अहम रही है। साल 2012 में परिसीमन के बाद यह सीट अस्तित्व में आई। पहले चुनाव में सपा के आदिल चौधरी ने बीएसपी के राशिद अखलाक के वोट बैंक में सेंध लगाई। इसका फायदा बीजेपी को मिला और रवींद्र सिंह भड़ाना पहली बार विधायक बने।
2017 में बसपा के हाजी याकूब कुरैशी के सामने कांग्रेस की मौजूदगी से समीकरण बदला और बीजेपी के सोमेंद्र सिंह तोमर चुनाव जीत गए।साल 2022 में भी बीजेपी को विपक्षी वोटों के बंटवारे का फायदा मिला। बीएसपी ने सपा के आदिल चौधरी के वोट बैंक में सेंध लगाई और सोमेंद्र सिंह तोमर बेहद कम अंतर से दूसरी बार विधानसभा पहुंचे।
दो बार के विधायक और योगी सरकार में मंत्री सोमेंद्र सिंह तोमर की दावेदारी फिलहाल मजबूत मानी जा रही है। गुर्जर वोट बैंक पर उनकी पकड़ उनके पक्ष में जाती है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि 2022 में कम अंतर से जीत मिलने के बाद बीजेपी के भीतर नए चेहरे को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। बीजेपी से विनीत चपराना (भूमि गांव), पूर्व ब्लॉक प्रमुख पप्पू प्रमुख, राजेंद्र लिसाड़ी और डॉक्टर अभिमन्यु समेत कई गुर्जर नेता टिकट की दौड़ में हैं। ऐसे में पार्टी के सामने सोमेंद्र तोमर को तीसरी बार मौका देने या नए चेहरे को उतारने का फैसला अहम होगा।
इंडिया गठबंधन के भीतर मेरठ दक्षिण सीट को लेकर सबसे ज्यादा हलचल दिखाई दे रही है। कांग्रेस की ओर से 2009 में सांसद रह चुके अवतार सिंह भड़ाना की सक्रियता ने मुकाबले को नया मोड़ दिया है। फरीदाबाद से लेकर खतौली तक चुनावी मैदान में सक्रिय रहे भड़ाना कांग्रेस के सिंबल पर दावेदारी कर रहे हैं। कांग्रेस से हेमंत प्रधान भी टिकट की रेस में हैं। दूसरी ओर सपा ने गुर्जर समुदाय के नेता को जिलाध्यक्ष बनाकर समीकरण साधने की कोशिश की है। पिछले चुनाव में मामूली अंतर से हारने वाले आदिल चौधरी के अलावा करीब आधा दर्जन गुर्जर नेता सपा से टिकट मांग रहे हैं।
मेरठ दक्षिण में बीएसपी, आजाद समाज पार्टी और एआईएमआईएम की मौजूदगी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। बसपा अपने पुराने जनाधार को मजबूत करने में जुटी है। चर्चा है कि पार्टी पूर्व सांसद शाहिद अखलाक के परिवार से किसी सदस्य या कुंवर दिलशाद पर दोबारा दांव लगा सकती है। आजाद समाज पार्टी भी इस बार मजबूती से मैदान में उतरने की तैयारी में है। अगर सपा किसी बड़े मुस्लिम या दलित नेता को टिकट नहीं देती है तो कई चेहरे आजाद समाज पार्टी का रुख कर सकते हैं।
वहीं असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम मुस्लिम वोटों में सेंध लगाकर मुख्य दलों के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में 2027 में मेरठ दक्षिण का मुकाबला सिर्फ बीजेपी बनाम सपा-कांग्रेस तक सीमित नहीं रहने वाला है। असली तस्वीर उम्मीदवारों के ऐलान और वोटों के बंटवारे के बाद ही साफ होगी।
Updated on:
13 Sep 2026, 8:31 AM IST
Published on:
13 Sep 2026, 8:11 AM IST
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