
नई दिल्ली। यूएस बिजनेस काउंसिल ने भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को एक खत लिखा है। इस खत में कहा गया है कि अमरीकी डिफेंस कंपनियां मेक इन इंडिया प्लान के तहत टेक्नोलॉजी पर पूरा मालिकाना हक चाहती हैं। उनका कहना है कि इसके लिए उनको भारत सरकार की ओर से पूरा आश्वासन मिल चाहिए। वहीं दूसरी ओर वे भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर जो रक्षा प्रोडक्ट बनाएंगी उसमें अगर गड़बड़ी आती है तो वे उनकी जिम्मेदार नहीं होंगी। अमरीकी कंपनियों के इस शर्त को पीएम मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के लिए झटका माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल भारतीय वायुसेना में मिग श्रेणी के विमान रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में देश को हाईटेक लड़ाकू विमानों की जरूरत है। अमरीकी कंपनी लोकहीड मार्टिन और बोइंग भारत को विमान सप्लाई करने के लिए तैयार है। लोकहीड ने रक्षा मंत्रालय से कहा है कि अगर उसे 100 सिंगल इंजर फाइटर विमान बनाने का टेंडर मिलता है तो वो वहीं टेक्सास और फोर्ट वर्थ स्थित एफ-16 प्रोडक्शन लाइन को भारत में शिफ्ट कर देगा। वहीं दूसरी ओर लोकहीड ने टाटा एडवांस सिस्टम को अपना स्थानीय पार्टनर चुना है। ऐसे में अब अमरीकी कंपनियां चाहती हैं कि उन्हें सेंसटिव टेक्नोलॉजी पर कंट्रोल मिले ताकि वे अपनी गुणवत्ता बरकरार रख सकें। वहीं दूसरी ओर ये कंपनियों प्रोडक्ट में गड़बड़ी आने पर उसकी जिम्मेदारी लेने को नहीं तैयार हैं।
तकनीक ट्रांसफर बनी समस्या
दरअसल पीएम मोदी चाहते हैं कि भारत रक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रोडक्ट के लिए दूसरे देशों पर निर्भर न रहे। पिछले रक्षा सौदों में पूरी तरह तकनीक ट्रांसफर नहीं होने की वजह से भारतीय रक्षा कारखाने असेंबलिंग यूनिट्स यानि को पोर्टों को जोड़ने के कारखाने के रूप में काम कर रहे हैं। पीएम मोदी के सलाहकारों ने भी इसमें बदलाव करते हुए तकनीक ट्रांसफर की बात कही थी, ताकि देश रक्षा प्रोडक्ट्स का खुद निर्माण कर सके।
Updated on:
19 Sep 2017, 10:24 PM IST
Published on:
19 Sep 2017, 7:18 PM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.