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नई दिल्ली। बिहार में एक बार फिर चमकी बीमारी यानी एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम ( AES ) से इस साल अब तक 82 बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें अकेले मुजफ्फरपुर में ही 69 बच्चों की मौत हुई है।
पिछले 24 घंटों में एसकेएमसीएच और केजरीवाल अस्पताल में भर्ती 13 बच्चों की मौत हो गई। आलम यह है कि राज्य में मौत का सिलसिला लगातार जारी है, लेकिन सरकार चमकी की इस 'तबाही' से पार में पाने में फेल साबित हो रही है।
पिछले कुछ सालों से गर्मी के मौसम में यह बीमारी बिहार में मौत का तांवड कर रही है। इसके बावजूद इस गंभीर बीमारी को लेकर सरकार सतर्क नहीं हो रही है।
अकेले मुजफ्फरपुर में 66 बच्चों की मौत
चमकी बीमारी से मुजफ्फपुर का इलाका सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां अब तक 66 बच्चों की मौत हो चुकी है। एसकेएमसीएच में 58 तो केजरीवाल हॉस्पिटल में 11 बच्चों की मौत हुई है। वहीं, समस्तीपुर जिले में भी शुक्रवार को दो बच्चों की मौत हो गई। अभी भी सैकड़ों बच्चे इलाजरत हैं और अलग-अलग हॉस्पिटल में भर्ती हैं।
अब तक 180 से ज्यादा बच्चे इस बीमारी के हुए शिकार
इस साल जनवरी से अब तक 180 से ज्यादा बच्चे इस संदिग्ध बीमारी के शिकार हुए हैं। हालांकि, कुछ बच्चे ठीक होकर घर वापस जा चुके हैं। लेकिन, ज्यादातर बच्चों की मौत हो गई। वहीं, एसकेएमसीएच और केजरीवाल हॉस्पिटल में अभी भी 80 बच्चों की इलाज जारी है।
जनवरी से जून तक 13 मामले
एसकेएमसीएच ( SKMCH ) मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक सुनील शाही ने बुधवार को बताया था कि 2 जून से लेकर 12 जून तक एक्यूट इंसेफेलाइटिस से पीड़ित 86 बच्चों को एडमिट किया गया। इसमें 31 बच्चों की मौत हो गई। उन्होंने बताया था कि जनवरी से लेकर 2 जून तक 13 मामले सामने आए थे, जिनमें 3 की मौत हो गई थी।
सरकार ने राज्य के 12 जिलों में 222 प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स को अलर्ट कर दिया है। साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे मरीजों के इलाज में किसी भी तरह की कोई लापरवाही नहीं बरतें।
कम उम्र के बच्चे हो रहे इस बीमारी का शिकार
डॉक्टर्स के मुताबिक, 15 वर्ष तक की उम्र के बच्चे चमकी बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। मरने वाले बच्चों की उम्र एक से सात साल के बीच है। इस बीमारी के शिकार आमतौर पर गरीब परिवार के बच्चे हो रहे हैं।
केंद्र से मिला हर संभव मदद का आश्वासन
शुक्रवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा था कि इस बीमारी से निपटने के लिए केंद्र की ओर से हर संभव मदद की जाएगी। उन्होंने कहा कि केंद्र से भेजे गए डॉक्टरों की टीम ने अस्पतालों का दौरा किया और राज्य सरकार को इस संबंध में जरूरी सलाह दी है।
हर्षवर्धन ने बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के साथ दो बैठकें भी की हैं। शुक्रवार ही की सुबह बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे हालात का जायजा लेने मुजफ्फरपुर पहुंचे थे। उन्होंने भी हालत को गंभीर बताते हुए सरकार की ओर से हर प्रयास किए जाने की बात कही थी। फिलहाल, जांच टीम की रिपोर्ट का इंतजार है।
लीची को बताया जा रहा है दोषी
बच्चों की मौत के लिए लीची को भी दोषी ठहराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि बच्चों के खाली पेट लीची खाने से वे इस सिंड्रोम की चपेट में आ जाते हैं। हालांकि, अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
दरअसल, 'द लैन्सेट' नाम की मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च में कहा गया है कि लीची में Hypoglycin A और MPCG नामक प्राकृतिक पदार्थ पाया जाता है। यह शरीर में फैटी एसिड मेटाबॉलिज्म बनने में रुकावट पैदा करता है। इसके कारण ब्लड-शुगर लो लेवल में चला जाता है और मस्तिष्क संबंधी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं जिससे दौरे पड़ने लगते हैं।
बीमारी की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने बच्चों को खाली पेट लीची न खाने की सलाह दी है। दरअसल, मुजफ्फरपुर और उससे आस-पास के इलाकों में लीची की पैदावार भारी तादाद में होती है। लिहाजा, गरीब परिवार के बच्चे में अक्सर रात में भूखे रह जाते हैं और सुबह खाली पेट लीची खा लेते हैं। जिसके कारण वे इस बीमारी के शिकार होते हैं।
10 सालों से जारी है इस बीमारी का प्रकोप
पिछले 10 सालों में इस बीमारी से सैकड़ों मासूमों की जान जा चुकी है। सबसे बड़ी बात ये है कि ये बीमारी गर्मी में आती है और हर साल अप्रैल से लेकर जून तक उच्च तापमान और नमी की अधिकता के बीच भयावह रूप लेती है। लेकिन, जैसे ही बारिश होती है इसका प्रकोप कम हो जाता है।
साल दर साल के आंकड़े
साल 2012 में 336 बच्चे प्रभावित हुए थे, इनमें 120 की मौत हो गई। वहीं, 2014 में प्रभावितों की संख्या 342 पहुंच गई, इनमें 86 की मौत हो गई। वहीं, 2016 व 17 में चार-चार तो 2018 में 11 बच्चों की मौत हुई। बारिश अच्छी होती है तो इसका असर कम होता है। लेकिन, अगर बारिश नहीं होती है तो यह बीमारी भयानक रूप धारण कर लेती है।
चमकी बुखार के लक्षण
- लगातार तेज बुखार चढ़े रहना
- लगातार उल्टी और दस्त
- कमजोरी की वजह से बेहोशी
- अंगों में रह-रहकर कंपन (चमकी) होना
- बदन में लगातार ऐंठन होना
- दांत पर दांत दबाए रहना
एईएस वर्षों बाद भी दुनिया के लिए रहस्यमय पहेली बनी हुई है। अमेरिका और इंग्लैंड के विशेषज्ञों की टीम भी इसके कारणों का पता नहीं लगा सकी। सीडीसी अमेरिका की टीम लक्षणों की पड़ताल करती रही, लेकिन वायरस का पता नहीं लगा पाई। सरकार भी बेबस है और इस बीमारी के आगे घुटने टेक चुकी है। लेकिन, सवाल यह कि इस बीमारी से क्या ऐसे ही हर साल बच्चे मरते रहेंगे या फिर सरकार कोई ठोस कदम उठाएगी।
Updated on:
15 Jun 2019 08:10 pm
Published on:
15 Jun 2019 09:42 am
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